हम कौन है ?

जगत को रचाय के,जीव को बनाय के,भूख से व्याकुल करि महि भटकायो है ।
जल थल पूर्ण करि गिरि पहाड चूर्ण करि,परत दर परत से भूलोक चटकायो है॥
काहू को बल दियो बल से कोई मल दियो काहू को बल विहीन करि काल गटकायो है।
काहू को बुद्धि दे बुद्धि से अवरुद्ध कर काहू को माया जाल के बीच मे लटकायो है॥

परमात्मा का रूप मनुष्य जीव जन्तु और जगत की जिन्दा मिथ्या के समिश्रित रूप मे समाहित है। एकोअहम के सिद्धान्त के अनुसार सभी एक है परन्तु कर्मप्रथकता सिद्धान्त के अनुसार सभी एक दूसरे से अलग अलग है। जो भौतिक रूप मे है वह कभी नही था और आगे वह नही रहेगा। जो है वह नही है और जो नही है वह है। इस है और नही है के फ़ेर का नाम ही जीवन है। जिस प्रकार से भौतिक वस्तु के क्षरण का एक निश्चित समय होता है उसी प्रकार से इस जीवित जगत का भी एक निश्चित समय है। एक एक कण बनता है फ़िर उसका क्षरण होता है वह क्षरण एक निश्चित समय पर पूरा होता है फ़िर उस क्षरण का नया रूप बनता है और उस नये रूप का क्षरण होने लगता है। यह क्रिया कालान्तर से चली आ रही है और चलती रहेगी।

सवाल पैदा होता है कि आखिर हम कौन है ? भौतिक रूप से उत्तर दिया जाये तो हम वही है जो हमे बताया जाता है,पिता अपना पुत्र कहता है माता कहती है हमने जन्म दिया है भाई बडे या छोटे भैया के रूप मे पुकारता है बहिन कहती है कि मेरा अच्छा भैया है। चाचा के लिये भतीजा है मामा के लिये भांजे है,पति के लिये पत्नी है और पत्नी के लिये पति है,पुत्र के लिये पिता है,पौत्र के लिये दादा है,जिन्दा के लिये श्रीमान है और मरने के बाद स्वर्गीय है। जो नाम दिया गया है वह जन्म के बाद दिया गया है,जो काम किया है वह करने के लिये बाध्य किया गया,बाधय्ता चाहे पेट भरने की हो,बाध्यता चाहे शरीर की आग को मिटाने की हो या बाध्यता चाहे मन की आग को शांत करने की हो,जो भी किया है वह अपने अनुसार तो किया ही नही है,जन्म से लेकर मौत तक दूसरो के लिये ही काम किया है अपने लिये तो कभी किया ही नही है ! अपने लिये अगर किया है तो वह किसी प्रकार से एक दूसरे की कभी कभी की सहायता,चाहे भूखो को भोजन देने से रही हो,बीमार को दवा दिलवाने से रही हो या फ़िर कभी कभी दूसरे की बिना किसी स्व-स्वार्थ के सहायता देने से रही हो,इसके बीच मे भी अगर अहम आ गया,इसे करने से पाप होगा इसे करने से पुण्य होगा तो वह की गयी सहायता ही पाप पुण्य की सीमा मे बंध कर कर्म सिद्धान्त मे बंध गये और मौत के बाद इस जगत में केवल गिनने के लिये रह गये,कुछ काल तक गिने गये और बाद मे वह भी गयी गुजरी आंधी की तरह से गायब हो गये।

अगर हंसते है तो मानसिक प्रफ़ुल्लता से हंसते है रोते है तो मानसिक क्लेश से रोते है जीवित है तो मानसिक मोह से जीते है मरते है तो मानसिक विछोह से मरते है,चोरी करते है तो मानसिक कमजोरी से करते है,मारते है तो मानसिक क्रूरता से मारते है,जिन्दा करते है मानसिक दया से करते है,पालते है तो मोह से पालते है,दुत्कारते है तो मानसिक गंदगी से दुत्कारते है,जो हो रहा है वह मानसिक रूप से ही हो रहा है,दिल से हो रहा है,कर्म से हो रहा है और जो हो रहा है वह भौतिक दिखता है और जो चल रहा है वह गुप्त रूप से चल रहा है न तो हमे पता है और न ही किसी को पता है,कि जो हो रहा है उसका फ़ल क्या प्राप्त होना है।

कीडे को जीवन और भोजन से मोह है,पशु को जीवन और भोजन से मोह है,मनुष्य को जीवन और भोजन से मोह है,भोजन के बाद क्रियायें और उन क्रियाओं से नये जीवन की उत्पत्ति। जीवन के लिये कार्य किये जाते है जीवन के लिये घर बनाये जाते है जीवन के लिये सर्दी गर्मी वर्षा से बचने के उपाय किये जाते है,गर्मी मे रहने के लिये ठंडक का निर्माण किया जाता है,सर्दी से बचने के लिये गर्मी की उत्पत्ति की जाती है बरसात से बचने के लिये सूखी जगह का निर्माण किया जाता है कच्चे को रोकने के लिये पक्का बनाया जाता है और पक्के को हटाने के लिये कच्चे का निर्माण किया जाता है। वायु की कमी को पूरा करने के लिये वायु का निर्माण किया जाता है आग की कमी को पूरा करने के लिये आग का निर्माण किया जाता है पानी की कमी को पूरा करने के लिये पानी की पूर्ति की जाती है। बीमार होने पर दवाई का निर्माण करके स्वस्थ किया जाता है,बीमार होने के लिये अखाद्य वस्तुओं का सेवन किया जाता है। अगर हम दवाई का निर्माण करते है तो हम फ़ार्मासिस्ट कहलाते है दवाई देने की कला को जानते है तो डाक्टर कहे जाते है और दवाई को हम खाते है तो मरीज के रूप मे बन जाते है। सर्दी के स्थान मे गर्मी से रहने पर गर्मी के स्थान पर सर्दी रहने पर बरसात के स्थान पर सूखे मे रहने पर हम अमीर कहे जाते है,वातावरण के अनुसार उसी के अनुसार रहने पर हम गरीब कहे जाते है।

चालाकी से अपना कार्य बनाने पर हम अपने को चालाक कहते है किसी की चालाकी मे आकर अपने को लुटवाने के कारण हम बेवकूफ़ कहे जाते है। दोनो भावो के रहने पर हम कभी चालाक और कभी बेवकूफ़ कहे जाते है। शरीर को सजाने और शरीर का ख्याल रखने पर हम खूबशूरत बन जाते है और शरीर का ध्यान नही रखने पर हम बदशूरत बन जाते है। साफ़ सफ़ाई रखने पर हम भले कहे जाते है और गंदगी रखने पर हम बुरे कहे जाते है,दोनो के रहने पर हम भले और बुरे दोनो प्रकार के कहे जाते है। किसी भी काम को लगातार करने पर हम सिद्धहस्त बन जाते है किसी काम को नही करने पर हम अज्ञानी रहते है। अपने कुल के अनुसार काम करने पर हम कुलीन होते है अपने कुल से दूर जाकर काम करने पर हम आवारा बन जाते है। अपने कुल के अनुसार अपने धर्म के अनुसार काम करने पर हमे अपने कुल और धर्म का फ़ल प्राप्त होता है और लोगो की नजर मे हम सही माने जाते है और लोग हमसे संतुष्ट हो जाते है उन्हे शांति मिलती है और इसी शांति को मोक्ष की परिभाषा से पूर्ण किया गया है।

अपने खुद के काम त्याग कर दूसरो के काम करने पर हम नेता कहे जाते है,अपनी भावनाओ को छुपाकर दूसरो की भावनाओ को प्रकट करने पर हम अभिनेता बन जाते है। वीरता से किये गये कामो के लिये हम पशु रूप की संज्ञा शेर की उपाधि प्राप्त करते है और चुपचाप प्रताणना को सहन करने के कारण भी हम पशु रूप की संज्ञा गधे से सुसज्जित किये जाते है। एक जिन्दा जीव को खाने वाला होता है तो दूसरा घास खाने वाला होता है। भावना में डर की उपाधि दी जाती है जिसे डर लगे वह कायर और जो डरे नही वह वीर,कायर मारा जाता है वीर मारता है,क्रिया मरने और मारने की ही है। माता पुत्र को पैदा करने के बाद अपने जीवन को पुत्र के लिये समर्पित कर देती है और उसके शरीर का क्षरण होने लगता है वह पुत्र को पालने की क्रिया मे अपने शरीर को बरबाद कर लेती है। पुत्र अपने शरीर को विवाह के बाद पत्नी और परिवार को चलाने के लिये अपने शरीर को बरबाद कर लेता है पिता का मोह पुत्र से और पुत्र का मोह अपने पुत्र से इस प्रकार के मोह का कारण ही शरीर क्षरण का सिद्धान्त बनता है। साधु गुफ़ा मे जाकर तपस्या करता है अपने शरीर को सुरक्षित रखने के लिये वह गुफ़ा का प्रयोग करता है,यानी चिन्ता शरीर की ही होती है। तपस्या का उद्देश्य खुद के जीवन को भगवत भाव मे लगाकर दूसरे की सहायता करने से होता है लेकिन अहम मे केवल एक ही बात मिलती है कि वह भी क्रिया को कर रहा है और उस क्रिया का कारण भी किसी न किसी प्रकार के क्षरण के लिये ही होता है। यानी हम एक दूसरे के क्षरण को पूर्ण करने के लिये जी रहे है मर रहे है सो रहे है जाग रहे है बैठे है भाग रहे है।

हवा हमारे अन्दर है तो हम हवा है आग हमारे अन्दर है तो हम आग है जल हमारे अन्दर है तो हम जल है आकाश हमारे अन्दर है तो हम आकाश है धरती हमारे अन्दर है तो हम धरती है। हम पुरुष रूप मे पुरुष है स्त्री रूप मे हम स्त्री है पशु रूप मे हम पशु है कीडे के रूप मे हम कीडे है। इन्सान के रूप मे हम इन्सान है जानवर के रूप मे हम जानवर है। अपने को जगा लिया तो हम बुद्धिमान है सोते रहे तो हम बेवकूफ़ है,जितनी क्रिया हमने जाग्रत अवस्था मे कर ली है वह हमारी बडी शिक्षा है और जितनी क्रिया हम नही कर पाये उतने ही हम अशिक्षित है। शिक्षित शिक्षा देने का काम कर रहा है और अशिक्षित शिक्षा को लेने का काम कर रहा है बीच का मूल रूप शिक्षा ही रही। कार्य के लिये कोई धन खर्च कर रहा है कोई कार्य करने के बाद धन को ले रहा है कार्य और धन के लिये एक के लिये कार्य गौढ रहा और दूसरे के लिये धन गौढ रहा लेकिन दोनो के लिये जो मूल रूप रहा वह जीवन यापन ही रहा,एक कार्य करवाने के बाद जीवन जीना चाहता है और एक कार्य को करने के बाद अपने जीवन को जीना चाहता है,मूल रूप जीवन ही रहा। जीवन का रूप परिवर्तन रहा और परिवर्तन का कारण ही जीवन है।

हम परिवर्तन है,परिवर्तन से हम आये और परिवर्तन हम कर रहे है,हमारा परिवर्तन भी आगे का परिवर्तन करता रहेगा।

शनि मंगल की राजनीति

भारतवर्ष की कुंडली के अनुसार शनि मंगल धन और तरक्की के साथ साथ बाहरी सम्बन्धो और राजनीति के कारक भी है। शनि जहां सरकारी कामो से धन देने के लिये माना जाता है वही वह अपनी स्थिति को दिखाने के लिये तरक्की और कार्यों का असर भी देता है। शनि प्रकृति सभी जानते है वह ठंडा भी है और आलसी भी है साथ ही चालाकी के लिये भी जाना जाता है जब शनि का असर राजकीय कार्यों के रूप मे भारत की कुंडली मे सामने आये तो इसी प्रकार के लोग आसानी से पहिचान मे आजाते है और वह लोग भी देखे जाते है जो राजकीय कार्यों को केवल नगद धन की नजर से देखते है उन्हे राजकीय कार्य करने के बाद कितना वेतन मिलता है इससे उनकी पहिचान नही की जाती है उन्हे अलावा धन शनि वाले कारणो से कितना मिलता है वह समझकर ही राजकीय कार्य की पहिचान की जाती है। भारत की स्वतंत्रता के पहले भी शनि अपनी नजर से देखा जाता था और शनि जैसे लोगो के द्वारा ही भारत पर अधिकार जमा कर रखा गया आजादी के बाद भी शनि ने अपनी पूरी पूरी शक्ति भारत के लिये सहेज कर रखी थी और आजाद होने के बाद से शनि के प्रति जिसे देखो वही अपनी आस्था को लेकर चल रहा है। धर्म पूजा पाठ और कर्मकांड मे भी शनि की स्थिति के अनुसार ही काम करना पडता है समाज मे भी शनि की महत्ता को इतना दे दिया गया है कि एक समुदाय को विशेष दर्जा देकर उन्हे आरक्षण तथा कम काम करने के बाद भी वही पुरस्कार दिया जाता है जो शनि से विलग लोगो को बहुत मेहनत करने के बाद दिया जाता है। शनि का रहना खाना काम करने का तरीका आदि सभी जानते है कि वह कितनी धीमी गति से चलता है नौ दिन मे अढाई कोश की सीमा से अधिक वह पार नही कर पाता है फ़िर भी लोग शनि को गले लगाकर चलने मे ही अपनी भलाई समझते है। राज्य का कारक मंगल होने के बाद शनि पर राज्य करने के लिये जब तक कोई अडंगा शनि के साथ नही लिया जाता है तब तक कोई भी शनि को सम्भालने मे हिम्मत नही रख सकता। शनि का रूप अगर बर्फ़ के रूप मे देखा जाये तो मंगल का रूप गर्मी के रूप मे समझा जा सकता है बर्फ़ को गर्मी मिलने पर ही पिघलाया जा सकता है बिना गर्मी के शनि अपने काम को नही कर सकता है नौकरी करने वालो लोगों को धर्म अर्थ काम और मोक्ष से अगर कन्ट्रोल मे नही रखा जाये तो वे किसी भी प्रकार से अपने कारणो को न तो कर सकते है और न ही किसी प्रकार से सफ़ल ही हो सकते है। शनि को परिवार के रूप मे देखा जाये तो वह बुजुर्गो की तरह से होता है,बुजुर्ग का दिमाग केवल दवाइयों से ही चलता है तो मंगल ही दवाइयों का कारक है। भारत के नेक मंगल ने भारत को सजाया संवारा है वीरो से पूर्ण किया है और वही बद मंगल ने जब बाहरी शक्तियों का सहारा लिया है तभी अपने विनाश का रास्ता भी देखा है अगर एक वीर पुरुष शराब कबाब तामसी कारणो मे फ़ंस जाये तो वह किसी भी प्रकार से अपने पौरुष रूपी प्रताप को नही रख सकता है। राहु शनि को रास्ता देता है और केतु शनि के साथ मिलकर रास्ते का निर्माण करता है शनि जहां है वहां की ही सोच केवल शनि के दिमाग वाले लोगो को देता है । कन्या राशि को गुप्त सम्बन्धो को सामने रखकर देखा जाता है गुप्त कारण बनने के बाद ही लोगो के लिये कर्जा लेने की जरूरत पडती है और गुप्त कारण बनने के बाद ही दुश्मनी तैयार होती है जब तक गुप्त रूप से प्रयोग किये जाने वाले आहार विहार का कारण नही देखा जायेगा तब तक बीमारी का रूप भी सामने नही आयेगा,यही कारण लोगो को अपने रोजाना के जीवन के लिये भी देखा जाता है और यही कारण बीमा बैंक फ़ायनेंस आदि के लिये देखा जाता है पिछले समय मे शनि के कन्या राशि मे होने से शनि ने लोगो के धन सम्बन्धी भेद उजागर किये और राहु ने भारत के बारहवे भाव मे रहकर गडे मुर्दे उखाडने के लिये अपनी शक्ति को प्रदान किया उधर केतु ने अपनी युति गुरु के साथ लेकर दो बाबा सामने कर दिये बडे बडे मनीषियों की समझ मे जो नही आया वह दो बाबाओं ने अपने प्रभाव से सामने करने की कोशिश की और बाबाओं का उद्देश्य केवल स्वार्थी भावना से दूर होता तो वह अपने उद्देश्य मे सफ़ल भी हो जाते और भारत के अन्दर से शनि वाली नीतियों को दूर भी कर सकते थे लेकिन उनका भी कारण शनि से जुडा हुआ था और तांत्रिक गति से केतु को केतु की नजर से उखाडने के लिये देखा गया भारत के स्वामी गुरु को मंगल की विदेशी नीति से गुरु के केतु यानी दोनो बाबाओं के साथ काम करने वाले शिष्यों के प्रति धारणा को उजागर किया गया और किसी को तो फ़र्जी पासपोर्ट के लिये और किसी को राजनीतिक पार्टी बनाने के लिये दोषी करार देकर उसी प्रकार से दूर कर दिया गया जैसे एक बाप के सामने उसके बेटे की बेइज्जती कर दी जाये और बाप के नाम को धब्बा लगा दिया जाय।

दया किस भाव से पैदा होती है ?

बडे बडे ज्योतिषियों से पहल हुई के दया का स्थान कुंडली में कहाँ होता है ? ज्योतिषियों के उत्तर इस प्रकार से सामने आये :-
  • दया का स्थान जीव के ह्रदय मे होता है और ह्रदय के द्वारा ही दया का भाव उत्पन्न होता है.
  • दया सम्बन्ध को समझने के बाद ही आती है सम्बन्ध सप्तम से भी होता है और ग्यारहवे से भी होते है.
  • दया अनुभव के बाद ही पैदा होती है जन्म से नही होती अनुभव काम करने के बाद आता है काम का भाव दसवां है.
  • दया का स्थान दिमाग मे होता है जब तक दिमाग काम नही करता है तब तक दया का अभाव ही रहता है और दिमाग का स्थान पांचवां होता है.
  • दया शरीर के प्रति भी की जाती है और किसी को बखशीस देने की क्रिया भी दया कहलाती है,बखशीस नवे भाव से देखी जाती है.
  • द्रश्य को देखकर समझकर और महसूस करने के बाद ही दया का प्रभाव पैदा होता है देखने की क्रिया दूसरे भाव से होती है समझने की क्रिया पांचवे भाव से होती है और महसूस करने की क्रिया चौथे भाव से होती है.
  • दया का क्षेत्र समाज देश परिवार और रहने वाले स्थान की जलवायु के अनुसार मिलता है समाज नवे भाव से देखा जाता है देश बारहवे भाव से देखा जाता है जलवायु चार आठ और बारह से देखी जाती है.
  • दया माता से मिलती है लेकिन माता को भी दया उनकी माता से मिलती है यह क्रिया लगातार चलती रहती है,यानी चौथे से चौथे चौथे भाव को देखते जाना.
  • दया चन्द्रमा से मिलती है लेकिन छः आठ बारह का चन्द्रमा दया नही रखता है.
  • दया कारण के पैदा होने के बाद ही पैदा होती है और कारण को पैदा करने के लिये राहु मंगल शनि केतु को देखा जाता है.
  • दया पिता के द्वारा मिलती है कारण माता तो पैदा करने वाली होती है लेकिन पिता दया से पालता है.
  • दया समाज मे प्रचलित धारणा के अनुसार मिलती है अगर समाज कसाइयों का है तो दया का रूप देखने को नही मिलेगा पर कसाई का बच्चा चोट खा जायेगा तो वह भी अपने पिता की दया से पूर्ण होता देखा जायेगा.
इन बातो के अलावा भी हजारो तरह के उत्तर सामने आये लेकिन सभी उत्तरो का रूप अगर देखा जाये तो समाज और परिवार से जुडने के बाद दया का प्रभाव पिता से मिलता है और पिता के स्थान को ही ज्योतिष मे धर्म का स्थान कहा जाता है धर्म के स्थान से जो मर्म स्थान की खोज की जाती है तो वह बारहवा स्थान ही मिलता है.

यंत्र विज्ञान और फ़ायदे नुकसान

यंत्र मंत्र तंत्र के बारे मे जो धरणायें प्राचीन काल से चली आ रही है उनके प्रति जानकारी करना जरूरी है। यंत्र जो आज के जमाने मे मशीन के नाम से जानी जाती है,तंत्र उस मशीन की कारीगरी को जानने की कला का नाम है और मंत्र उस यंत्र को संचालित करने की कला के प्रति अपनी धारणा को व्यक्त करना माना जाता है। शरीर भी एक यंत्र है इसे संचालन की कला का जानना मंत्र है और उसके अन्दरूनी कार्यों व्यवहार को जानना तंत्र है। भौतिकता मे वस्तु का उपयोग निर्जीव वस्तु से लिया जाने वाला कार्य और कार्य की कला के बारे मे आधुनिक विज्ञान से साबित करके दिखा ही दिया है। जितनी भी जलचर थलचर नभचर जीवित वस्तुये है जिनके अन्दर जड चेतन सभी आजाते है जड के अन्दर पेड पौधे और चलने फ़िरने वाले चेतन के रूप मे दिखाई देते है सभी के प्रति तांत्रिक यांत्रिक और मांत्रिक कारण समझना हर किसी एक के वश की बात नही है,अलग अलग विभाग बनाकर अलग अलग रूप से सभी के बारे मे जानकारी दी जाती है जैसे जैसे मनुष्य की कल्पना शक्ति का विकास हो रहा है,वैसे वैसे यंत्र मंत्र तंत्र का विकास हो रहा है,भौतिक रूप मे वह मसीनो के रूप मे और जीवन के प्रति तरह तरह की खोजो और कोशिकीय विश्लेषण के रूप मे आप सभी को पता होगा ही। मैने अभी कहा है कि हमारा शरीर भी एक यंत्र है और इस शरीर के बारे मे जानना ही तंत्र है तथा इस शरीर को संचालन करने का ज्ञान प्राप्त करना ही मंत्र है,इसी प्रकार से हमारा रहनेका स्थान भी एक यंत्र है रहने वाले स्थान के बारे मे तकनीकी जानकारी तंत्र है और रहने मे जो भावना प्रकट की जाती है वह ही मंत्र है। हमारे विज्ञान मे प्राचीन काल से ही द्रश्य श्रव्य और भव्य यानी जो देखी जा सके सुनी जा सके महसूस की जा सके उन तकनीको का विकास किया था। साथ ही शरीर विज्ञान के लिये कई तरह के सिद्धांत प्रतिपादित किये थे,सभी मे अपनी अपनी विशेषता थी। मनुष्य को परा और अपरा शक्ति का आभास भी होता था और वह इन शक्तियों के विकास मे लगा हुआ भी था। जिन यंत्रो का विकास प्राचीन काल मे कर लिया गया था उनके बारे मे आज भी विज्ञान अपने कार्यों मे लगा हुआ है और उन कारको की खोज कर रहा है जिन कारको से प्राचीन काल मे यंत्रो का प्रयोग किया जाता था। जैसे कुबेर का पुष्पक विमान जो मन की इच्छा से चलता था उसे किसी प्रकार के ईंधन की जरूरत नही पडती थी। उस समय के आग्नेय हथियार जो युद्ध मे प्रयोग किये जाते थे उन हथियारो की शक्ति खत्म नही होती थी जो वाल्मीकि रामायण मे शतघ्नी के नाम से लिखे गये है,आदि की बाते पढने को सुनने और महसूस करने के लिये प्रेरित करती है।
मिश्र की पिरामिड कला को सभी लोग जानते होंगे वह भी एक जीवित उदाहरण यंत्र के रूप मे है जिसमे हजारो साल एक मृत शरीर को रखा जा सकता था तथा उस शरीर को प्राकृतिक क्षरीय कारण बरबाद नही कर सकते थे। प्राचीन काल मे बाधा निवारण के लिये यंत्रो का प्रयोग भी किया जाता था उन यंत्रो के अनुसार ही धर्म स्थान और पूजा पाठ आदि के लिये स्थान भी बनाये जाते थे,तथा यंत्र की विशेषता से उनके अन्दर एक पराशक्ति का विकास किया जाता था उस पराशक्ति का रूप अप्रत्यक्ष रूप से महसूस होने की बात भी देखी जाती थी,उदाहरण के रूप में उज्जैन के मंगलनाथ नामक स्थान पर मंगल के यंत्र की विशेषता और मिलने वाले प्रत्यक्ष प्रमाणो के लिये बहुत अधिक जानने की धारणा भी उन लोगो के लिये नही होगे जो उस स्थान पर जा चुके है और मंगल ग्रह की प्रत्यक्ष शक्ति को महसूस कर चुके है। महाराजा विक्रमादित्य की सिंहासन बतीसी वाली कथा जो एक काल्पनिक बात लगती है लेकिन उस समय के इतिहास और प्राप्त साक्ष्यों के आधार पर सुनने और पढने मे तो अजीब लगती है लेकिन उनका प्रयोग और उनका प्रमाण आज भी किसी न किसी रूप मे देखा जा सकता है। यही बात वनस्पति शास्त्रो मे देखने को मिलती है,जैसे वृक्ष महसूस भी करते है और आपसी व्यवहार भी रखते है प्रत्यक्ष रूप से देखने के लिये छुई मुई के पेड को छूने से वह अपनी पत्तियों को सिकोड लेता है,केले के पेड को काटने के समय पहले सफ़ेद और बाद मे लाल रंग का पदार्थ बनना शुरु हो जाता है,उस सफ़ेद और लाल रंग के पदार्थ मे बहुत बडी असमानता होती है,सफ़ेद पदार्थ को अगर हथेली मे लगा लिया जाये तो केवल पानी से ही साफ़ हो जायेगा और लाल रंग के पदार्थ को हथेली मे लगाने के बाद साबुन और अन्य प्रकारो से हाथ को साफ़ करने के बाद ही हाथ साफ़ होगा इसी प्रकार से नीम और बबूल के पेड के बारे मे भी कई बाते साक्षात देखने को मिलती है,जैसे नीम के पेड को काट दिया जाये और काटने के तीसरे या नवे महिने मे जरूर दुर्घटना का सामना करना पडता है,बबूल के पेड को काटने के बाद कितनी ही कोशिश की जाये लेकिन घर का कोई न कोई सदस्य एक सम्पत्ति का विनास कर ही देगा आदि बाते अप्रत्यक्ष रूप से अपने कारण पैदा करने के लिये माने जाते है।
ज्योतिष मे मुहूर्त को बहुत से लोग जानते होंगे,अक्सर विवाह के लिये घर बनाने के लिये गाडी खरीदने के लिये मुहूर्त को लोग पूंछा करते है कई लोग बिना मुहूर्त के ही अपने सामान को लेकर आजाते है लेकिन एक कार्य शुभ मुहूर्त मे किया और और एक कार्य अशुभ मुहूर्त मे किया हुआ कितने काम आ सकता है या उसका फ़ल कितना अच्छा और बुरा मिलता है उसके बारे विद्व जन अपने अपने अनुभव को समझ कर बता ही सकते है। जो गाडी सफ़र आदि करवाने मे बडी भूमिका को अदा करती है वही गाडी पूरे परिवार को काल के गाल मे भी डाल देती है,जो घर वंश को चलाने के लिये अपना अच्छा असर प्रदान करता है वही घर बसे बसाये परिवार को उजाडने मे अपनी गति प्रदान करत है। जैसे शरीर की संरचना को बद्लाने के लिये आपरेशन आदि करने के बाद डाक्टर कई कारण बनाते है वही प्रकार घर मे अगर कोई बिगाड हो जाता है तो उसे वास्तु से सम्भाला भी जाता है,किसी बुरे मुहूर्त मे कोई सामान अगर खरीद लिया जाता है तो उस सामान मे शुभता लाने के लिये उपाय भी किये जाते है,यह उसी प्रकार से है जैसे कोई घडी गलत समय देती है तो उस घडी को सुधारक के पास लेजाकर उसकी मशीन मे फ़ेर बदल करवा देते है उसकी टाइमिंग मे परिवर्तन करवाकर घडी को सही कर लेते है। ज्योतिष के अनुसा रत्न भी एक यंत्र का काम करते है उन्हे साफ़ करने के बाद उनकी कटाई रत्न के ग्रह के मालिक के अनुसार करना और रत्न के ग्रह के योग मे उसे धारण करना आदि रत्न की कीमत भी बढा देता है और बहुत उपयोगी भी बना देता है। लेकिन हारा हुआ आदमी और हारा हुआ घोडा अपनी शक्ति को जुटाने मे शुरु के समय मे असमर्थ ही रहता है उसे कोई भी कारण एक बार तो खराब लगता ही है कारण उसे हार दिलाने मे उसी के कारणो ने ही तो बाध्य किया था आदि बाते समझने की भी जरूरत होती है।

घर बनाने का योग

अपने घर मे रहने की सभी की चाहत होती है लेकिन घर किस्मत से ही बनता है जब योग बनता है योग के साथ अन्य कारको का संयोग बनता है तो घर बनना शुरु हो जाता है।घर बनने का समय अलग अलग राशियों के लिये अलग जीवन के वर्षों मे आता है। शिक्षा शादी घर बच्चे,शिक्षा घर शादी बच्चे,घर शिक्षा शादी बच्चे,यह तीन कारण ही घर को बनाने के लिये माने जाते है। एक पिता की दो सन्तान है तो या तो पिता के बनाये हुये घर मे रहा जाये और पिता के बाद घर का बंटवारा करने के बाद अपने अपने कारणो से उस बने हुये घर मे रहना शुरू कर दे,कालान्तर में सन्तति के बढ़ने पर और कही जाकर अपने अपने आशियानों को बनाए.यह सिद्धांत घर शिक्षा शादी बच्चे के प्रति अपनी भावना को प्रस्तुत करता है,इसके बाद जब पढाई लिखाई पूरी कर ली और नौकरी आदि के लिए दूसरे स्थान पर जाना पड़ गया साथ ही जीवन साथी भी पढ़ा लिखा मिला तो दूसरी जगह ही शादी भी कर ली और शादी करने के बाद काम ऐसे शान पर मिला जहां से रोज रोज घर आना नहीं हो पाता घर भी वही बना लिया और बच्चे आदि वही पर हुए तो यह सिद्धांत शिक्षा शादी घर बच्चे पर निर्भर हो गया.इसके अलावा पिता के द्वारा कोइ व्यवसाय किया जा रहा है और उस व्यवसाय में ही जुड़ना पडा,व्यवसाय के चलते शिक्षा भी चलाती रही और समय आया तो शादी भी कर दी और शादी के बाद उसी व्यवसाय के स्थान के आसपास ही घर बना लिया यह सिद्धांत शादी शिक्षा घर बच्चे वाला हो गया.यह तीनो सिद्धांत ज्योतिष के अनुसार चौथे भाव आठवे भाव और बारहवे भाव से सम्बन्धित है.दूसरा भाव शिक्षा शादी और घर बच्चे वाला दूसरा सिद्धान्त घर शिक्षा शादी और बच्चे वाला है तीसरा सिद्धान्त जो बारहवे भाव से जुडा है घर शिक्षा और शादी बच्चे से सम्बन्धित होता है। अलग अलग राशियों के लिये अलग अलग सिद्धान्त होते है,जैसे मेष राशि वाला पैदा कहीं होगा पलेगा कहीं और शादी कहीं करेगा फ़िर बच्चे कहीं जाकर पैदा होंगे,वृष राशि वाला रहेगा एक ही क्षेत्र मे लेकिन उसकी घर बनाने की नीति शिक्षा की नीति और शादी करने की नीति भिन्नता मे होगी,मिथुन रासि वाला पैदा कही होगा शादी कहीं होगी और बच्चे कहीं पैदा होंगे और घर कहीं बनेगा,इसी प्रकार से कर्क राशि वाला रहेगा अपने ही घर पर लेकिन समय के अनुसार अपने अपने कारण से जायेगा चारो दिशाओ मे,सिंह राशि वाला पैदा होगा किसी स्थान पर अपने कार्य किसी स्थान पर करेगा और रहेगा किसी अन्य स्थान पर,कन्या राशि वाला कही पैदा होगा कही शादी होगी कही बच्चे पैदा होंगे और घर कहीं और बनेगा जाकर,इसी प्रकार से तुला राशि वाले के लिये भी है जहां पैदा होगा वहां शादी भी होगी पहला बच्चा भी वहीं पैदा होगा लेकिन घर कहीं जाकर बनायेगा,वृश्चिक रासि वाला जातक भी इसी प्रकार से रहेगा अपने ही स्थान पर लेकिन शादी कही करेगा घर बनाने के लिये अपने पिता के परिवार की तरफ़ ही भागेगा,धनु राशि वाला जातक भी मेष राशि की सोच का होगा और मकर राशि वाला कही पैदा होगा कहींजाकर पलेगा फ़िर शिक्षा किसी स्थान पर होगी काम कहीं करेगा लेकिन घर कहीं बनायेगा और रहेगा कहीं और जाकर,कुम्भ राशि वाला भी अपने पिता की जायदाद या पैदा होने वाले स्थान पर निर्भर रहेगा अधिकतर मामले मे इस राशि वाले की शादी होने के बाद वह पत्नी या पति पर ही निर्भर हो जाता है। मीन राशि वाला कभी अपने जन्म स्थान पर नही रहेगा वह बडे संस्थान बनाने के चक्कर मे जीवन भर भटकने के लिये माना जायेगा।

घर मन्दिर या धर्मशाला

धन की चाहत रखने वालो के लिये घर धर्मशाला बन जाता है और धर्म की चाहत रखने वालो के लिये घर मन्दिर बन जाता है। उत्तर मुखी दक्षिण मुखी घर धन को ग्रहण करते है और दक्षिण मुखी घर धन को उगलते है। इसके साथ ही पूर्व मुखी घर धर्म को प्रदान करते है और पश्चिम मुखी घर धर्म को ग्रहण करते है.यह बात घर को धर्मशाला यानी कोई भी आये जाये के लिये मान्य होजाती है। लेकिन जो लोग घर को मन्दिर बनाने की कोशिश मे होते है उनके लिये ईशान मुखी घर मे धर्म को ग्रहण करता है और नैतृत्य मुख्यी घर धर्म को छोड कर अधर्म को ग्रहण करने के लिये देखा जाता है। इस प्रकार के घरो मे भी जब बनावट का रूप बिगड जाता है तो घर की दशा भी विपरीत फ़ल प्रदान करने लगती है। और जब विपरीत दिशा का घर भी सही रूप मे बन जाता है तो बजाय उल्टे फ़ल के सही फ़ल प्रदान करने लगता है। जो धन को बचाना चाहते है वह खर्च नही कर सकते है और जो धन को खर्च करना जानते है वह कभी बचत नही कर सकते है। जो कमाना जानते है वह खर्च करना नही जानते है और जो खर्च करना जानते है वह कमाना नही जानते है,जो कमाना और खर्च करना जानते है वही जीवन मे तरक्की कर जाते है।
घर को मन्दिर समझने वाले लोग इंसानी व्यवहार को कमा जाते है और घर को धर्मशाला समझने वाले लोग व्यवहार और व्यापार को कमा जाते है,व्यवहार भी जस का तस होता है,जो किया है उसके बदले मे ही उतना ही मिलेगा व्यापार जितना किया है उतना ही लाभ या हानि देगा। लेकिन घर को मन्दिर बनाने वाले भौतिकता मे सुखी भले ही न रहे लेकिन इंसानी कारणो से सुखी रहते है। घर को धर्मशाला समझने वाले लोग अस्पतालो मे जाते है और मन्दिर समझने वाले लोग तीर्थ स्थानो और धर्म स्थानो मे जाते है। घर को धर्मशाला समझने वाले लोग कोर्ट केश और अदालती कारणो मे इंसानी न्याय के प्रति आशा रखते है और घर को मन्दिर समझने वाले लोग भगवान के प्रति समर्पित होकर अपने प्रति न्याय की आशा भगवान से रखते है। घर को धर्मशाला समझने वाले लोग वकीलो को खर्चा देकर या पुलिस वालो को खर्चा देकर अपनी दुखो वाली स्थिति से निपटने का काम करते है और घर को मन्दिर समझने वाले लोग धर्म स्थानो के पुजारियों मौलवियों और पादरियों को अपनी गुहार देकर भगवान के दरबार मे दुखो से निपटने की क्रिया को करते है। इसी प्रकार से घर को मन्दिर समझने वाले लोग अपने घर के बडे बूढो और मान्य सदस्यों की इज्जत करते है घर को धर्मशाला समझने वाले लोग जो अधिक धनी होता है जिसके अधिक ठाटबाट होते है उसकी इज्जत को करना जानते है। घर को मन्दिर समझने वाले मिल बैठ कर भोजन करते है और समय से अपने घर मे आते है,लेकिन घर को धर्मशाला समझने वाले लोग मनचाहे समय पर घर मे आते है मन चाहे स्थान पर भोजन करते है उनका अधिकतर भोजन बाहर के होटलो मे और दोस्तो के घर पर ही होता है। घर को मन्दिर समझने वाले लोग अपनी पत्नी पति आदि के लिये समर्पित होते है जबकि घर को धर्मशाला समझने वाले जब तक स्वार्थ है अथवा जब तक शारीरिक और धन की चाहत पूरी होती रहती है पति पत्नी को जीवन साथी मानते है और जैसे ही यह सब समाप्त हुआ दूसरा उपाय सोचने लगते है। घर को मन्दिर समझने वाले लोग जीव हत्या से डरते है और सभी जीवो पर दया करते है लेकिन घर को धर्मशाला समझने वाले लोग नानवेज भोजन और शराब पार्टियां आदि घर मे करने लगते है।
घर को धर्मशाला समझने वाले घर को धन की जरूरत मे बेच भी सकते है और घर बनाकर उनका व्यापार भी कर सकते है लेकिन घर को मन्दिर समझने वाले लोग अपने रहने वाले स्थान को अपनी मौत तक सम्भाल कर रखते है अपनी बाप दादा की जायदाद को सम्भाल कर रखते है। जो घर को मन्दिर समझते है उनके बच्चे खून से सम्बन्धित रिस्तेदारी मे विश्वास करते है जो घर को धर्मशाला समझते है उनके बच्चे मन के माफ़िक रिस्तेदारी करते भी है और समय आने पर बदलने से भी नही चूकते है। घर को मन्दिर समझने वालो लोगों की लक्ष्मी दासी होती है जबकि घर को धर्मशाला समझने वाले लक्ष्मी के दास होते है। इन बातो को समझ कर आप ही खुद सोच लीजिये कि आपने घर बनाया है या धर्मशाला।

ताजमहल की कुर्सी

दुनिया में भारतवर्ष और भारतवर्ष में उत्तर प्रदेश और उत्तरप्रदेश में आगरा,आगरा का ताजमहल, मेरे ख्याल से दुनिया कोइ ही ऐसा व्यक्ति होगा जो ताजमहल के बारे में नहीं जानता होगा.इतिहास कुछ भी हो,कहानी कुछ भी हो,कारण कुछ भी हो लेकिन ताजमहल का शानी इस संसार में नहीं है,हो भी नहीं सकता है,इसका कारण इस स्थान की महानता ज्योतिष के छाया ग्रह राहू ने ही प्रदान की है.मनुष्य अपने धर्म के अनुसार इसे कोइ भी रूप दे दे लेकिन यह इमारत इबादत की इमारत के नाम से जानी जाती है,भले ही शाहजहाँ का नाम मुमताज के लिए बताया जाए और मुमताज के नाम से ताजमहल का नाम मुम हटा कर लिया जाए,लेकिन जो वास्तविकता है वह सच से दूर करना साधारण बात नहीं है.

ताजमहल की इमारत को बनाने के लिए कितने ही कारीगरों ने अपने मेहनत रूपी तपस्या को जग जाहिर किया किस प्रकार से राजस्थान के मकराना से खुदा हुआ संगमरमर का पत्थर आगरा तक उस समय की जटिल बाधाओं से लाया गया उसे काटा गया छाँटा गया मूर्त रूप देकर सकारात्मक किया गया,फिर भवन कला और वास्तुकला का अनूठा उदाहरण पेश किया गया,यह प्रकृति की महानता मानी जाए,तो बहुत बढ़िया बात है,इसे कीई प्रकार के कारण से जोड़ना बेकार की बात है.इस इमारत का निर्माण यमुना नदी के दक्षिणी किनारे पर हुआ है इस प्रकार से उत्तर की तरफ यमुना का बहना साथ ही ईशान कोण से यमुना का पूर्व की तरफ घूम जाना भी एक प्रकार से प्रकृति का करिश्माई कारण ही माना जाता है.चारो तरफ चार मीनारे बीच में गुम्बद और गुम्बद के नीचे बनी ऊपरी भाग में नकली कब्रे और नीचे बनी असली कब्रे तथा असली कब्र पर गिरता बूँद बूँद पानी आज तक लोगो की सोच से परे है की यह पानी आता कहाँ से है,सर्दी गर्मी बरसात किसी भी ऋतू में बिना किसी अवरोध के यह पानी अपनी निश्चित समय रेखा में लगातार गिरता है.

इस ताजमहल को बनाने के समय इसके दक्षिणी सिरे पर एक कुर्सी का निर्माण किया गया था,यह कुर्सी केवल उन्ही लोगो के लिए है जो आकर अपनी उपस्थिति को देने के लिए अपनी फोटो को बनवाते है,पहले लोग अपनी फोटो बनवाने के लिए ब्रूस और केनवास का प्रयोग करने वाले कारीगरों का सहारा लिया करते थे फिर कैमरे का चलन होने के बाद कैमरा वाले फोटोग्राफर अपना काम करने लगे बाद में डिजिटल फोटोग्राफी आने के बाद लोग अपने अपने कैमरे से इस कुर्सी का प्रयोग करने लगे,कभी कभी तो एक एक घंटा लोग पंक्ति में खड़े रहते है की उनका भी नंबर आये और वे अपनी विभिन्न मुद्रा में अपनी फोटो ताजमहल के साथ बनवाकर अपनी यादो को ताज के साथ बरकरार रख सके.इस कुर्सी का सही मायनों में जिन लोगो ने महत्व समझा है वे ही ताज के महत्व को समझते है.

लाल पत्थर के कितने ही किले बने है और उन किलो में एक सफ़ेद पत्थर का रूप ताजमहल में ही मिलता है,जो छवि ताजमहल की है उस छवि की कल्पना करने के लिए कितने ही कवियों ने अपनी अपनी भावना को प्रस्तुत किया है लेकिन आज भी कोइ न कोइ नई छवि इस इमारत के लिए बनाती है और वह छवि अपने एक अनोखे रूप में अपने को प्रस्तुत करती है.इस कुर्सी पर जो बैठ कर अपनी तस्वीर बनवाता है उस छवि को निहारने के लिए ताज का रूप बिलकुल उसी व्यक्ति के अनुरूप बन जाता है,जैसा वह व्यक्ति है.

ताजमहल को बनवाने के समय जो कारण प्रकृति ने प्रस्तुत किये उनके अनुसार राहू ग्रह की सीमा के अनुसार ही इसे बनाना माना जा सकता है,जैसे राहू की सीमा वैदिक नियमो के अनुसार पंद्रह सौ मील (सौ योजन,डेढ़ मील का एक योजन) के अनुसार ही बना है.अगर आगरा से भारत के दक्षिणी सीमा को नापा जाए तो श्री लंका का आख़िरी हिस्सा पंद्रह सौ मील ही है,पश्चिम में बन्दर अब्बास से आगे कर्मोस्ताज तक पूर्व में चीन के कूमिंग यान तक तथा उत्तर में रूस की सीमा तक माना जाता है.आगरा नामक स्थान पर २७ अक्षांश उत्तर और अठत्तर देशांतर पूर्व में स्थिति है.ग्रह कक्षा के अनुसार राहू का केंद्र बिंदु इसी स्थान पर माना जाता है,प्रत्येक अठारह साल में यह अपने अनुसार बदलाव करता है.

इस स्थान पर जो कुर्सी संगमरमर की बनी हुयी उसके बारे में कोइ ऐतिहासिक कथन नहीं मिलता है,कब किसने और किस प्रयोजन के लिए इस कुर्सी को यहाँ बनवाया था लेकिन आज यह फोटो ग्राफी के लिए मशहूर कुर्सी है. वास्तुकला से यह कुर्सी जिस स्थान पर है वह स्थान एकाधिकार का स्थान कहा जाता है जब कोइ भी व्यक्ति इस स्थान पर बैठ कर अपनी तस्वीर बनवाता है तो उसे यह पता नहीं होता है की वह किसी अन्य स्थान से आया है उसे यही महशूश होता है की वह ही इस ताजमहल का मालिक है,भले ही कुर्सी से उठाने के बाद उसे यह समझ में आये की वह अन्य देश से अन्य प्रांत से अन्य शहर से अन्य जाति से अन्य कारण से आया है इस कुर्सी पर बैठने के बाद हर व्यक्ति यही सोचता है की वह भी मुमताज और शाहजहाँ के रूप में एक प्रेमी है और वह भी इस इमारत के सामने बैठ कर अपने मन वचन और कर्म से अपने जीवन साथी के प्रति समर्पित है,अक्सर यहाँ लोग जीवन में तीन बार अवश्य आते देखे गए है,जो एक बार आता है वह अपने जीवन में दो बार अवश्य ताजमहल के दर्शन को आता है चाहे कारण कोइ भी हो या किसी भी प्रकार की चाहत या संगती मिली हो.

ताजमहल एक अमर और सृष्टि के समय तक अपना स्थायित्व रखने वाली इमारत है,जब तक इंसान आपस में प्रेम करता रहेगा इस इमारत का कोइ भी बाल बांका नहीं हो सकता है,भारत ही नहीं किसी भी स्थान के बारे में आप वास्तु से देख सकते है की जिस स्थान पर भी उत्तर या पूर दिशा में प्राकृतिक जल स्तोत्र है वह स्थान हमेशा के लिए कायम हो जाता है,भले ही वह धार्मिक रूप से हो या भले ही वह बढ़ती हुयी जनसंख्या उद्योग धंधो की भरमार से हो अक्सर इस प्रकार की इमारते शहर आदि हमेशा ही धार्मिक रूप से देखे जाते है,जैसे भारत में अगर समुद्री स्थानों को देखा जाए तो कलकत्ता गंगासागर जगन्नाथपुरी आदि जो भी समुद्र से पश्चिम में बसे है उनके लिए कोइ न कोइ कारण धार्मिक रूप से जुडा है कानपुर में ब्रह्मावर्त इलाहाबाद में संगम जिसमे प्रयाग के ईशान में गंगाजी का बहाव है,दिल्ली में यमुना हरिद्वार में गंगा जी आदि स्थानों को देख कर धार्मिकता के रूप में माना जाता है,दिशाओं के अनुसार जो भी शहर या इमारत या स्थान प्राकृतिक जल स्तोत्र से दक्षिण पश्चिम में स्थापित हो जाता है वह राहू के रूप में देखा जाता है और उसकी महिमा किसी न किसी रूप में फैलती जाती है लेकिन जो स्थान प्राकृतिक जल स्तोत्र से उत्तर पूर दिशा में स्थापित हो जाता है वह केतु के रूप में स्थापित होता है जैसे वनारस मुम्बई पोरबंदर आदि शहर इन स्थानों पर राहू व्यक्तियों के अन्दर निवास करने लगता है.क्राइम के लिए जितने भी शहर प्राकृतिक जल स्तोत्र से उत्तर पूर्व में स्थापित होते है इनके अन्दर अधिक से अधिक क्राइम मारकाट नशे वाली बाते डाक्टरी कारण केवल इसलिए ही मिलते है की व्यक्ति के अंदर राहू प्रवेश करजाता है और व्यक्ति अपनी साख को पैदा करने के लिए अपनी मर्जी का अधिकारी हो जाता है,अक्सर ऐसे स्थानों के लोग अपनी प्रसिद्धि के लिए कोइ भी कार्य कर सकते है.

करपात्री से कारपात्री तक

मकान का बनाना और मकान मे रहना तथा मकान के फ़ल को भोगना अलग अलग प्रकार की बाते है। मकान को सभी उसी प्रकार से बना सकते है जैसे शादी के बाद शरीर और मानसिक दशा ठीक रही तो सन्तान जल्दी आजाती है सन्तान की उम्र और मकान मे रहना दोनो एक प्रकार से देखे जाते है और सन्तान कितना सुख देगी इस बात का अन्दाज बनाये हुये मकान मे रहने से देखा जाता है। जन्म के समय मे राहु बारहवा है ओ लाख धन से युक्त घर मे जन्म ले लिया जाये सुख की प्राप्ति जन्म से लेकर एक सौ बासठ महिने की उम्र तक नही मिल पाता है,किसी न किसी प्रकार की चिन्ता हर तीसरी साल मे मिलने लगती है। उसी प्रकार से अगर घर बनाने के समय मे घर की पूर्व दिशा मे संडास बना लिया है तो इतने ही समय तक रहने वाले घर मे आफ़त का होना माना जाता है। अगर चौथे भाव मे राहु पैदा होने के समय मे है तो शिक्षा के क्षेत्र से लेकर कार्य के क्षेत्र तक किसी प्रकार की सन्तुष्टि नही मिलती है उसी प्रकार से जब घर को बनाते समय घर की उत्तर दिशा मे संडास का निर्माण कर लिया जाये तो गलत प्रसिद्धि तो मिलती ही है धन भी बेकार के साधनो से आने लगता है और इस प्रकार से घर की सन्तान किसी न किसी प्रकार से बरबाद होने लगती है। अष्टम मे राहु जन्म के समय होता है तो जीवन का पतानही होता है कि कब ऊपर जाने का बुलावा आजाये,अगर कोई धन प्रदान करने वाली राशि मे या धन देने वाले ग्रह के साथ मे राहु है तो समझना चाहिये कि धन पर यह राहु अपना हाथ साफ़ करने के बाद अपना करिश्मा दिखा देता है उसी प्रकार से जब ठीक दक्षिण-पश्चिम मे संडास का निर्माण कर दिया जाता है तो घर के सदस्य अस्पताली दवाइयों के खाने के आदी हो जाते है और घर के बुजुर्गों के अन्दर अन्जानी बीमारी हो जाने से घर के अन्दर सडांध आने लगती है घर के पास के जो पडौसी होते है वे घात लगाकर बैठे होते है कि कब इस घर मे तडफ़डाहट हो और घर वालो को अपने चंगुल मे लेकर बरबाद कर दिया जाये।

लगन का राहु जीवन के शुरुआती समय मे करपात्री यानी दूसरो के भरोसे रहकर ही कार्य करने खाने पीने शिक्षा को प्राप्त करने के लिये माना जाता है। लेकिन उम्र की दूसरी सीढी मे जाकर वह कारपात्री यानी कार घर मकान और सुख सुविधा से युक्त बना देता है। दूसरे भाव का राहु कहने को तो अपनी डींग हांकने के लिये काफ़ी होता है लेकिन जब हाथ मे देखा जाता है तो झूठ के अलावा और कुछ नही देखा जाता है,अक्सर इसी प्रकार के लोगो के लिये एक कहावत - "ढपोल शंख" की दी गयी है लेकिन उम्र की दूसरी सीढी मे जाते जाते बच गये तो कोई अन्जाना व्यक्ति आकर अपनी सहायता देने लगता है या जो भी काम दलाली से किये जाते है अक्समात ही भंडार भर देता है और वह कर पात्री से लेकर कारपात्री की श्रेणी मे आजाता है। तीसरे राहु को मेष राशि मिथुन राशि सिंह राशि तुला राशि धनु राशि कुम्भ राशि के लिये कपडो गाने बजाने मनोरंजन के साधनो अपने को प्रदर्शित करने के मामले में राजनीति के मामले मे कानूनी मामले मे बढ चढ कर बोलने की आदत होती है लेकिन जब उन्हे पता लगता है कि उनके द्वारा पैदा किये सभी साधन बेकार के हो गये है उनके लिये सिवाय अपने पूर्वजो की सम्पत्ति का सहारा लिये आगे का जीवन नही चलने वाला है तो वे कारपात्री से कर पात्री की श्रेणी मे गिने जाने लगते है।

सौ में सूर सहस मे काणा

भदावरी क्षेत्र मे एक कहावत बहुत ही मशहूर है,और यह कहावत एक सौ एक प्रतिशत भी है -"सौ मे सूर सहस मे काणा,एक लाख मे ऐंचक ताना,ऐचंक ताना करे पुकार,कंजा से रहियो हुशियार,जाके हिये न एकहु बार,ताको कंजा ताबेदार,छोट गर्दना करे पुकार,कहा करे छाती को बार",अर्थात- सौर लोगो को अपनी बातों में फ़ंसाने के लिये एक अन्धा आदमी काफ़ी है,पहले उसके लिये हर आदमी के अन्दर दया है,दूसरे बाहर की आंखे नही होने के कारण अन्धे आदमी को सोचने समझने की और अन्तर्द्रिष्टि भी बहुत मजबूत होती है यानी अन्दाज लगाने की कला,स्पर्श अनुभव श्रव्य अनुभव आदि की अच्छी जानकारी होती है भगवान श्रीकृष्ण के लिये सूरदास जी के भजन सबसे अधिक इसीलिये ही भावुकता से पूर्ण है कि उन्हे अनुभव करने की अजीब क्षमता भी बाहरी दुनिया को नही देखने पर और अपने मन के अन्दर सुनी हुयी बातो को अन्दाज से जो रूप बनाकर देखा जाता था वह बाहरी आंखो से सम्बभ नही माना जा सकता है। इसलिये अन्धे आदमी के द्वारा अपनी भावनाओ से सौ लोगों को चलाया जा सकता है। जब बन्दूको चलाया जाता है या तीर को कमान से छोडा जाता है,तो एक आंख को बन्द कर लिया जाता है,लेकिन जिस व्यक्ति की एक आंख चली गयी हो तो वह एक आंख से ही पूरी दुनिया को देखना शुरु कर देता है,एक आंख वाले व्यक्ति को काणे की उपाधि दी गयी है और इस प्रकार के व्यक्ति के अन्दर एक हजार लोगो को एक समय मे चलाने की हिम्मत होती है वह जो भी कारण बताता है वह अक्सर खरा और सही उतरता है,जो भी अनुभव और धारणा बनती है वह एक प्रकार से एक ही जगह पर अपना ध्यान रखने के कारण ज्ञान के क्षेत्र मे उत्तम मानी जाती है। इसी धारणा के कारण एक आंख वाले व्यक्ति अपनी ज्ञान शक्ति से एक हजार आदमी को अपने अनुसार चलाने मे समर्थ होते है। अक्सर देखा जाता है कि आप अपनी बात को कहना शुरु करते हो और दूसरा आदमी आपकी शुरु की गयी बात को अक्समात कहने लगता है जब आपकी बात शुरु की गयी बात को दूसरा आदमी कहना शुरु कर दे तो आपको चुप रहना जरूरी हो जाता है,इसका मतलब है बात को काट देना और बात को काट कर अपने अनुसार उस बात को कहना शुरु कर देना,इस प्रकार से आपकी मान्यता तो खत्म हो गयी और उस बात को शुरु करने वाले व्यक्ति की बात चलने लग गयी। इस प्रकार के व्यक्ति को ऐंचकताना की उपाधि दी जाती है इस प्रकार का व्यक्ति अनुभवी होता है और सभी क्षेत्रो मे अपनी जानकारी को रखने वाला होता है वह बात चाहे आज की हो या इतिहास से सम्बन्धित हो किसी की परेशानी वाली बात हो या न्याय वाली बात हो इस प्रकार का व्यक्ति एक लाख लोगो को अपने अनुसार चलाने की हिम्मत रखता है। इसी प्रकार के लोग अक्सर वकील का काम करने मे सफ़ल हो जाते है किसी प्रकार के राजनीति के क्षेत्र मे और मीडिया के क्षेत्र मे सफ़ल होते भी देखे गये है। जब किसी प्रकार का नौकरी आदि का इन्टरव्यू आदि होता है तो इसी प्रकार के लोग अधिक जानकारी रखने के कारण को सोच कर अपनी योजना मे सफ़ल हो जाते है। दो व्यक्ति अगर अपने सामान को बेच रहे होते है और एक व्यक्ति उनके अन्दर ऐंचकताना की आदत को रखता है तो वह अपने माल को बेच कर आजायेगा जबकि दूसरा आदमी बिना बेचे ही वापस आयेगा। भूरी आंखो वाले व्यक्ति को कंजा की उपाधि दी जाती है जिसकी आंखे भूरी होती है वह अपनी योजना को अपने अनुसार ही लेकर चलने वाला होता है वह अपने भेद को किसी को नही बताता है कि वह अगले पल क्या करने जा रहा है। जब किसी को भेद का पता नही होगा तो वह अपने कार्य को बडी आसानी से कर भी आयेगा और किसी को पता भी नही चलेगा,अगर वह पास मे रहने वाला है तो वह अपने कारणो को इस प्रकार से प्रयोग मे लायेगा कि वह आपको काट कर भी चला जाये और आपको पता भी नही लगे,यानी खुद को तो कारण से दूर रखेगा और ठंडा पानी देकर यही साबित करेगा कि वह बहुत ही हितैषी है लेकिन अन्दर से वह दूसरे आदमी से या दूसरे कारण से खुद ही फ़ंसाकर खुद ही छुडाने की कोशिश करता हुआ दिखाई देगा इस प्रकार का आदमी ऐंचकताना व्यक्ति से भी खतरनाक माना जाता है। पुरुष वर्ग के लिये एक बात देखी जा सकती है कि जिसके छाती मे बाल नही होते है उसकी बात का भरोसा नही होता है। कहने के लिये तो वह बहुत कुछ कह जायेगा लेकिन अपनी योजना को किसी को नही बतायेगा अक्सर अवसरवादी लोगो की श्रेणी मे इस प्रकार के लोगो को देखा जा सकता है। वे बात के पक्के नही माने जाते है और अपने खुद के लिये भी अपनी योजना मे सफ़ल नही होते है,अपने ही परिवार के लोगो को भी वे अपने अनुसार खड्डे मे ले जा सकते है,अपनी योजना को सफ़ल करने के लिये वे सौ फ़ायदे आपको बता कर जायेंगे लेकिन जो फ़ायदे आपके लिये बताये है वे उन्ही के लिये सही माने जायेंगे आपको फ़ायदा होना तो दूर नुकसान भी नही माना जा सकता है बल्कि पूरी की पूरी पूंजी का खात्मा होना ही एक प्रकार से अधिक समझना ठीक होगा। इस प्रकार के लोग अपनी संतान के भी नही होते है और अपनी संतान को भी ठिकाने लगा सकते है साथ ही अपनी योजना को साम दाम दण्ड भेद से पूरी करने मे सफ़ल होते देखे जा सकते है। सबसे खतरनाक और अपनी चालाकी मे सभी पर अपनी योग्यता की छाप छोडने के लिये छोटी गर्दन वाला व्यक्ति माना जा सकता है। इस प्रकार का व्यक्ति किसी भी क्षेत्र मे अपने को आगे निकाल ले जाता है चुगली करना और चुगली से भेद को लेकर दूसरो का सफ़ाया करना ही उसका काम होता है,वह अपने फ़ायदे के लिये एक भीड को समाप्त कर सकता है साथ ही किसी भी प्रकार की राजनीति मे वह आगे बढकर सफ़ल हो सकता है। 

नाहर मुखी और गोमुखी

वास्तु मे नाहर मुखी और गोमुखी का फ़र्क भी समझना बहुत जरूरी होता है। गोमुखी घर मे रहने वाले सदस्यों की संख्या मे बढोत्तरी होती रहती है जबकि नाहर मुखी घर अक्सर सदस्यों के अभाव मे सूने हो जाते है। जिन घरो मे यह प्रभाव घर के दो तरफ़ या तीन तरफ़ होता है उन्हे बहुत ही सतर्क रहने की जरूरत पडती है।
गोमुखी मकान का पिछला हिस्सा चौडा हो जाता है और दरवाजे तक आते आते संकडा हो जाता है ऐसे मकान गोमुखी कहलाते है। ऐसे मकानो मे सदस्यों की संख्या बढती रहती है और घर मे धन की कमी देखी जाती है अक्सर आलस्य का होना और कमाई के साधनो मे कमी होना घर के सदस्यों का काम मे मन नही लगना और बेकार की कारणो को घर के अन्दर ही पैदा करते रहना घर के कई हिस्से हो जाना और फ़िर भी आपस मे सामजस्य नही बैठना माना जाता है। अक्सर ऐसे घरो मे एक सदस्य बहुत ही धार्मिक रहता हुआ देखा जा सकता है जो किसी भी धर्म से सम्बन्धित हो लेकिन वह धर्म के मामले मे पक्का आशावादी होता है। मृत्यु सम्बन्धी कारण उस व्यक्ति के रहते हुये बहुत ही कम होते है,जहां नाहर मुखी मकानो मे अस्पताली कारण बहुत बनते रहते है वही गोमुखी मकानो मे रहने वाले लोगो को या तो कोई रोग होता नही है और होता भी है तो वह जरा सी दवाइयों में ही ठीक हो जाता है। अगर यही प्रभाव व्यवसाय के लिये देखा जाये तो ऐसे दुकानो मे या व्यवसाय स्थानो मे जो माल आकर रखा गया वह रखा ही रहता है यानी कम बिकता है जो कर्मचारी आकर बैठ गया है उसे निकलने मे काफ़ी कठिनाई रहती है। अगर संस्थान घाटे मे भी चल रहा है तो कर्मचारी कई महिने तक बिना वेतन के काम भी करते देखे जा सकते है। रोजाना के कामो के अन्दर केवल माल की गणना और उसी स्थान मे माल को इधर से उधर रखने वाली बात मानी जा सकती है जब कि नाहर मुखी व्यवसाय स्थानो मे अक्सर देखा जाता है कि माल का टोटा ही बना रहता है ग्राहको की भीड तो लगती है लेकिन माल के कम होने से अक्सर लोग खरीद करने के लिये इन्तजार करते ही देखे जा सकते है।नाहर मुखी मकानो का गेट अगर दक्षिण की तरफ़ है और वह अस्पताल इन्जीनियरिन्ग तकनीकी होटल या बिजली आदि से सम्बन्धित नही है तो अक्सर आग लूटपाट या माल के खराब होने के कारको मे अधिक देखा जाता है वही अगर इन उपरोक्त कारको से सम्बन्धित व्यवसाय है तो खूब चलते भी देखे जा सकते है और आय भी अधिक होती देखी जाती है। गोमुखी संस्थान का मुख अगर दक्षिण की तरफ़ है और वह होटल आदि से सम्बन्धित है तो उस होटल के रूम अधिकतर भरे ही रहते है लेकिन होटल के कर्मचारी अक्सर आलसी होते है या काम को सही नही करने के कारण अक्सर गंदगी से पूर्ण देखे जा सकते है लेकिन ग्राहक फ़िर भी कम नही होते है। यही हाल अगर किसी प्रकार से खानपान से सम्बन्धित है तो अक्सर इस प्रकार के संस्थानो मे माल को सडता हुआ या किसी प्रकार से गलत उत्पादन से भी माल को बिगडता देखा जा सकता है। बिजली आदि के काम के लिये भी देखा जा सकता है कि एक बार कोई सामान ठीक करवा दिया गया है लेकिन जल्दी ही वह किसी न किसी कमी से वापस आजाता है या उसके किसी सामान के नही मिलने से वह काफ़ी समय तक पडा रहता है। अक्सर ऐसे संस्थानो मे एक बात और देखी जा सकती है कि ग्राहक कभी कभी अपने सामान को ठीक करवाने के लिये लाता भी है और उसके पास उस सामान को उठाने के लिये या तो वक्त नही होता है और जब वक्त होता है तो सामान की मजदूरी को चुकाने के लिये धन का अभाव हो जाता है इस प्रकार से अधिक दिन तक सामान का पडा रहना भी माना जा सकता है।
नाहर मुखी दुकान का दरवाजा अगर पूर्व मे है तो माल को दान खाते मे अधिक जाता हुआ देखा जाता है अथवा जान पहिचान और उधार के मामले भी देखे जाते है या तो उस सामान को बेचने के बाद उगाही नही की जाती है या की भी जाती है तो औने पौने दामो मे सामान को बेचना भी देखा जा सकता है। यही प्रकार आफ़िस आदि के लिये भी देखा जा सकता है या तो कर्मचारी कार्य मे टिकता नही है और टिकता भी है तो मालिक के लिये कोई न कोई ऐसा कारण पैदा करता रहता है मालिक खुद ही दुकान पर आना बन्द कर देता है और दुकान केवल कर्मचारी के भरोसे पर चलती रहती है वह अपने खर्चे को निकालने के अलावा दुकान आदि का किराया अथवा उसके खर्चो को भी मुश्किल से निकाल कर दे पाता है। नाहर मुखी दुकान का दरवाजा अगर उत्तर की तरफ़ होता है तो धन आदि के लिये बहुत उत्तम माना जाता है ब्याज का काम करने वाली कम्पनिया लोगो को गहने जेवरात आदि पर लोन देने वाली कम्पनिया ट्रान्स्पोर्ट कम्पनिया खूब चलती देखी जा सकती है। कर्मचारी अगर एक बार चला जाता है तो जल्दी ही कर्मचारी आ भी जाता है इसलिये दुकान मालिक को परेशानी नही होती है। इसी प्रकार से नाहर मुखी संस्थान का मुंह अगर पश्चिम की तरफ़ होता है तो भी देखा जाता है कि माल कम ही रुकता है और बिल्डिंग मैटेरियल वाहन वाले काम खाद बीज की दुकान रोजाना के उपयोग के लिये प्रयोग किया जाने वाला प्लास्टिक आदि का सामान खूब बिकता देखा जा सकता है कपडों की दुकाने भी खूब चलती देखी जा सकती है जो लोग सेल लगाकर काम करने वाले होते है अगर वह अपनी सेल का मुख्य दरवाजा पश्चिम मुखी करने के बाद नाहर मुखी कारण को पैदा करते है तो उनकी सेल मे लगा हुआ सामान जल्दी ही निकल जाता है लेकिन वही सेल अगर गोमुखी स्थान मे कर लिया गया है तो माल जैसा का तैसा भी पडा रहता है और खूब अच्छा होने के बावजूद भी कोई खरीदने वाला नही होता है।

प्लाट नम्बर 31

हम अपने अनुसार जमीन लेकर घर बनाते है और जिस प्रकार से सरकारी स्कीम और सोसाइटी हमे जमीन देती है उसका नम्बर होता है दुर्भाग्य से अगर नम्बर इकत्तीस मिलता है तो उसके बारे क्या क्या फ़ल हमे अच्छे बुरे मिलते है यह एक शोधित विषय है और इस विषय पर पच्चीस साल की विवेचना मेरे खुद के द्वारा की गयी है.
प्लाट नम्बर 31 नाम गोपाल सिंह
अपने भाइयों और घर वालो से त्यक्त होकर उक्त व्यक्ति ने अपने को बहुत ही तिरस्कृत काम मे लगाया,जैसे घोडों की साफ़ सफ़ाई करना तबेले के अन्दर से उनकी लीद साफ़ करना घोडो के दाने से कुछ हिस्सा चुराकर घर लाना और उससे परिवार की पालन पोषण की जरूरतो को पूरा करना,इसके अलावा भी शहर में अलावा समय मे घूमते रहना और जहां किसी का आवारा पशु जैसे गाय भैंस आदि देखी उसे पकड कर अपने घर मे ले आना उसकी तीमारदारी करना अगर दूध देने लग गयी तो दूध बेचना या छाछ गोबर आदि बेच कर अपने काम का गुजारा करना,अक्समात ही किसी अनजान बीमारी से ग्रसित होना और अन्तगति को प्राप्त होना.
उनकी मृत्यु के बाद उनके पुत्र को उसी स्थान पर नौकरी पर लगना उसका भी काम वैसा ही होना जैसा बाप का था सरकारी तबेला होने के कारण पिता की मौत के बाद धन का मिलना उससे उस घर को बनवाना और उस घर मे किरायेदारो का रखना,माँ का भूखा प्यासा एक ही कमरे मे रहना कभी कभी किरायेदारो से उसे भोजन का दिया जाना या उसकी बहिनो के द्वारा समय समय पर सहायता देते रहना। अन्जान बीमारी का साथ मे बने रहना और शरीर से पनपने की बजाय कुछ भी खाने पीने का मन नही करना जब भी मन चलना तो तामसी भोजन की तरफ़ मन चलना,पत्नी का अतिचारी हो जाना कुकृत्य मे मन को लगाये रखना,किरायेदारो मे केवल पुरुषों को रखना और उनसे अपनी इच्छानुसार कार्य करवाना। सन्तान के मामले मे केवल दो पुत्री ही होना और आपरेशन के कारण किसी अन्जान नश के कटने के कारण आगे की सन्तान मे बाधा होना।दान धर्म पुण्य आदि से दूर रहना,अलावा कमाई के लिये रात को निकलना और आसपास के क्षेत्र से लकडी आदि को काटकर लाना सुखाकर बेचना आदि काम।
प्लाट नम्बर 31 नाम गोमाराम
पिता के गांव की जमीन का सरकारी क्षेत्र मे आजाना उससे मिलने वाले मुआवजे से शहर मे आकर घर का बनवा लेना और उसे किराये से चलाना। खुद को नौकरी आदि के लिये घूमना सफ़ल नही होने पर चाट पकौडी का ठेला लगाना उस काम की ओट मे अन्य अनैतिक कार्य करना,अचानक एक ही रात मे माता पिता का गुजर जाना,अन्त्येष्टि के दिन खुद का एक्सीडेन्ट हो जाना माता पिता की अर्थी को भी कन्धा नही दे पाना,उनकी मृत्योपरान्त की क्रियायें नही हो पाना। पत्नी का लकवा मे चले जाना एक तरफ़ का धड सुन्न हो जाना किसी भी दवाई से ठीक नही होना,सन्तान मे एक पुत्र और एक पुत्री का होना,पुत्र का पढाई लिखाई मे मन नही लगना उसका आवारा घूमना जवान होने पर रीकवरी के काम मे लगना जो भी कमाना वह अनैतिक कामो मे खर्च कर लेना,पुत्री का विजातीय व्यक्ति के साथ भाग जाना,पुत्र का एक हत्या के केश मे आजीवन कारावास हो जाना,जो भी मकान का किराया आना उससे पति पत्नी और वकील आदि का खर्चा करना कोर्ट कचहरी पुत्र के लिये भागते रहना लेकिन नौ साल गुजरने के बाद भी जमानत नही होना।
दुकान नम्बर 31 मेडिकल स्टोर 
प्रसिद्ध अस्पताल के सामने दुकान का होना शुरु मे बहुत जोरो से दुकान का चलना,दुकान मे अचानक तीसरी साल आग लग जाना,इन्श्योरेशं से भी कोई सहायता नही मिल पाना कम्पनियों की दवाई का भुगतान करना और उधारी का सिर पर चढ जाना,जोड तोड कर पैत्रिक सम्पत्ति का निकाल देना उसकी एवज मे फ़िर से दुकान पर माल भरना अचानक सरकारी नीति का बदलना और अस्पताल मे फ़्री दवाइयों का बंटना दुकान पर नौकर का भी खर्चा नही निकलना दवा कम्पनियों के तकादे से तंग आकर घर पर पडे रहना दुकान पर आना ही नही। सिर पर घर के खर्चो के अलावा ब्याज और इसी प्रकार के कारण पैदा होते जाना,बच्चो की शिक्षा का रुकना घर का लोन  चलना और बैंक से बार बार घर को खाली करवाने के लिये जोर आना,एक दिन घर से अचानक गायब हो जाना,बच्चे और उनकी माता के द्वारा गारमेंट की कम्पनी मे रोजनदारी से काम करना।
इसी प्रकार से अन्य घरो और दुकान व्यवसाय स्थानो आदि के नम्बरो को देखा उनके मालिको से बात की तो किसी का भी पनपने वाला कारण नही देखा।

कारण
संख्या शास्त्र के अनुसार यह नम्बर मोक्ष देने का कारक बताया गया है,इस नम्बर के अनुसार इस तारीख मे जन्म लेने वाले जातक भी अपने जीवन की जद्दोजहद मे आगे बढने की बहुत इच्छा रखते है लेकिन लाख कोशिश करने के बाद वे आगे नही निकल पाते है। तीन काम पूरे करने के बाद जैसे ही काम की आखिरी मंजिल पर जाते है उनका एक काम उन तीनो कामो को समाप्त कर देता है। यह इकत्तीस नम्बर का खेल सांप सीढी के खेल से कम नही माना जा सकता है। जैसे इस खेल मे निन्यानबे की श्रेणी मे जाते ही वापस नीचे आजाते है उसी प्रकार से इस नम्बर से जुडे जातक आगे बढकर कर भी तीसरी सीढी पर जाकर वापस नीचे आजाते है। हिन्दी शास्त्रो के अनुसार तीस के बाद एक का मतलब होता है एक महिना काम करने के बाद एक दिन और अधिक काम करना,इसी बात का प्रयोग हिब्रू ने भी अपने लेखों मे किया है कि यह नम्बर एक प्रकार से केतु की श्रेणी मे आता है और वाहन आदि के नम्बरो का जोड भी अगर इस नम्बर से आता है तो वाहन कितना ही कीमती भी क्यों न हो वह मिट्टी के भाव मे ही एक दिन चला जाता है। इस नम्बर का जातक अगर किसी प्रकार से मृत्यु सम्बन्धी कामो को करने वाला जैसे चर्च या कब्रिस्तान मे काम करने वाला होता है तो उसे आशातीत सहायताये मिलती रहती है जो डाक्टर इस तारीख के जन्म लेने वाले होते है और अपनी डाक्टरी की सेवा मुर्दो को देते है यानी पोस्टमार्टम आदि मे अपना कार्य जारी रखते है तो उनकी सेवा बहुत अच्छी चलती रहती है लेकिन इस काम को करने वाले डाक्टर राहु के द्वारा ही अपने को सुरक्षित रख पाते है यानी वे किसी न किसी प्रकार के नशे से युक्त माने जाते है। इस नम्बर वाले जातक अगर किसी के साथ चलना शुरु कर देते है तो यह भी देखा गया है कि अलावा नम्बर वाले व्यक्ति बर्फ़ मे लगने से नही बचते है। जैसे एक नम्बर वाला जातक अगर राजनीति मे सफ़ल होता चला जाता है और जैसे ही उसके साथ इस नम्बर वाला व्यक्ति साथ मे आता है उस व्यक्ति की पोजीशन बर्फ़ मे लग जाती है उसे वापस उठने मे कोई भी सहायता नही मिल पाती है। कबाडी का काम करने वाले इस नम्बर का फ़ायदा लेते देखे गये है जो माल किसी के पास नही बिकता है इस नम्बर वाले व्यक्ति उस माल को आसानी से बेचने मे सफ़ल होते देखे गये है,जो लोग इस नम्बर से युक्त है और वे भूत प्रेत तंत्र मंत्र आदि मे लग जाते है तो उनकी ख्याति अघोरी बाबा के रूप मे मिलती है। लोग उनकी कार्य शैली को साधारण आदमी की श्रेणी मे नही ला पाते है। अक्सर इस नम्बर वाले स्थान जातक आदि पर भूत प्रेतो का शासन माना जाता है।

सामजस्य

घर परिवार और मुहल्ला समाज मे हर आदमी को अपने अपने अनुसार सामजस्य बैठाकर चलना पडता है। दूसरे मायने मे कहा जाये तो हर आदमी को अपने अपने अनुसार बांध कर चलना पड सकता है। घर के खर्चो मे भी और बाहर के रिस्तो मे भी अपने को बांध कर चलना बहुत जरूरी है। जैसे अचानक घर मे गैस खत्म हो जाये तो कोई बात नही चूल्हे पर रोटी बनाने मे कोई हर्ज नही है यह नही होना चाहिये कि गैस के खत्म होने पर घर मे कोहराम मच जाये कि गैस ही नही है और रोटी कैसे बने ? अगर रोटी नही बनेगी तो भोजन कैसे प्राप्त होगा लेकिन घर के अन्दर अगर समझदार लोग है तो महसूस भी नही होने देंगे कि कब गैस खत्म हो गयी और कब आ गयी लेकिन रोटी समय से मिलती रही। वक्त वेवक्त के लिये घर मे एक लोहे का बना हुआ उठाऊ चूल्हा जरूर होना चाहिये सर्दी मे कभी कभी आग तापने की जरूरत पड ही जाती है और इस चूल्हे के होने से एक तो घर के अन्दर का लकडी का बेकार का सामान भी काम मे आजाता है दूसरे ठंड से दूर होने के लिये आग तापने को भी मिल जाती है लेकिन यह काम उन घरो मे नही हो सकता है जहां वातानुकूलित घर है वहां तो इस बात से दूर ही रहना पड सकता है। कभी कभी कुकर पर बनी सब्जियां भी खाने से जी भर जाता है फ़िर तलाश होती है किसी ऐसे होटल की जहां पर कडाही का बना खाना मिले और कढाई मे भी तभी खाना पकाया जा सकता है जब धीमी आंच पर सब्जी को बनाया गया हो और जब धीमी धीमी आंच पर सब्जी बनेगी तो बहुत ही उम्दा स्वाद भी होगा और रोजाना की गैस की पकी सब्जी खाने से स्वाद मे भी बदलाव होगा।
 अगर कढाही मे आलू के साथ पनीर भी डाला गया हो और मटर को भी हरी मिर्च के साथ डालकर धीमी आंच मे पकाया गया हो तो उस सब्जी का स्वाद भी निराला ही होगा जब पकाने वाले को कला भी आती हो और वह उन बातो से दूर हो कि काली कढाही मे सब्जी बनाते वक्त सेहत के लिये भी कोई दिक्कत आ सकती है,जब आलू को उगाते समय खादो का प्रयोग किया जाता है दूध का पनीर बनाते वक्त यह ध्यान नही रखा जाता है कि दूध को फ़ाडने के वक्त जो कैमिकल प्रयोग मे लाये जाते है वे किस प्रकार से बने है या पनीर को बनाते समय किस मशीन को कैसे प्रयोग मे लाया गया है तो फ़ालतू मे अपने घर पर उन बातो को नही पैदा करना चाहिये कि आलू के साथ पनीर बनाने के वक्त मे जलने वाली आग मे कौन सी लकडी का प्रयोग किया गया है। वैसे भी लकडी के लिये जंगल अब खोजने के बाद भी नही मिलते है वह तो भला हो कांग्रेस का जिसने विलायती बबूल को पूरे भारत मे हवाई जहाज से बिखेर कर हरिक्रान्ति के नाम पर बडे बडे कांटो वाले वाले वृक्ष उगा दिये है जो किसी भी अलावा वनस्पति को नही उगने देते और अपनी ही गरिमा को कायम रखने के लिये जमीन से उष्ण्ता को तो खींचते ही है साथ मे जो भी पौधो के पोषक तत्व होते है उन्हे भी खींच कर अपनी लकडी को बनाने मे काम आते है यह भी मेरे ख्याल से अंग्रेजो का एक ख्याल होना चाहिये था कि जब भारत मे कोई जडी बूटी ही नही मिलेगी तो भारत मे लोग अपने आप ही अंग्रेजी दवाइयों के घेरे मे आजायेंगे और उनके बनाये हुये अस्पतालों जाकर भर्ती होंगे फ़िर वे जैसा चाहेंगे वैसा व्यवहार मरीजो के साथ करेंगे उनके अन्दर उन तत्वो को इंजेक्सन और दवाइयों से भर दिया जायेगा जो शरीर मे जाकर अंग्रेजी व्यवहार को करने के लिये अपने आप जिम्मेदार हो जायेंगे।
भाषा से तो उन्होने दूर ही कर दिया है साथ ही आदमी के अन्दर इतना बडा भेद भाव पैदा कर दिया है कि वह अपने अलावा और किसी को जानता ही नही है अगर गांव का आदमी किसी शहरी औरत से शादी कर लेता है तो उसका गांव का व्यवहार खत्म होता ही है वह शहर के माहौल मे भी अपने को नही ढाल पाता है वह कभी तो गांव के ख्याल अपने मन मे लाता रहता है कभी वह अपने ख्यालो मे शहर की चमक दमक मे लेकर चलने लगता है उसकी औलाद ऐसी होती है कि वह अपने पिता के गांव की सभ्यता को तो बेहूदा मानने लगती और अपने को आगे बढाने के लिये वह गांव के प्रति भी दुर्भावना रखने लगती है। जो सब्जी कढाही मे बनायी गयी थी वह बनी तो चूल्हे पर थी लेकिन उसे लाकर जब सजे सजाये कमरे मे बनाकर रखा जाता है तो वह शहरी सब्जी बन जाती है और ऊपर से जो हरा धनिया आदि डालकर उसे छींट का कलर दिया जाता है तो उसकी बात ही कुछ और होती है वह सजावटी सब्जी के रूप मे देखी जाती है और जिसे देखो वही कहने लगता है भाई यह तो बहुत अच्छी और देखने मे सुन्दर लगती है। अक्सर कहा जाता है कि भोजन और भजन को कभी अकेले मे करने से मजा नही आता है कीर्तन को तो साथ साथ करने मे बहुत ही अच्छा लगता है भोजन को भी साथ साथ मे करना बहुत अच्छा लगता है अगर उसी भोजन को अपने पडौस के लोगों के साथ किया जाये और भी बात होती है इस बात से इस बात का तो मजा ही होता है कि बोलने चालने मे और व्यवहार आदि मे दुख सुख मे किसी भी कारण के बनने से पडौसी भाग कर पहले आजाते है कई लोग अपने पडौसी से ही लडाई झगडा कर लेते है उन्हे लगता है कि उनके सामने पडौसी की कोई औकात नही है वह भूल जाता है कि जिस कार्य के लिये वह शहर मे आया है उसी कार्य से उसके पडौसी का भी आना हुआ है।
अपने ही घर मे पडौसी के साथ बैठकर खाना खाया जाये तो बहुत ही अच्छा लगता है कई जगह पर जाने के बाद पता चला कि जिसके घर गये थे उसके घर तो आने जाने के वक्त ही खाना खा पाये वरना पडौसी ही अपने यहां निमंत्रण देकर चले जाते और विभिन्न प्रकार का भोजन करने के बाद पता चलता कि कैसी सामजस्यता बैठाकर लोग आपस मे रहते है उन्हे इस बात का पता ही नही होता है कि वे एक परिवार के है या अलग अलग परिवार के है इसके साथ ही मजा तब और अधिक आता है जब पडौसी अलग अलग प्रांत के हो या अलग अलग सभ्यता से जुडे हो कारण उनके यहां बनने वाला भोजन बिलकुल ही अलग होता है और वह भोजन कुछ मानसिक इच्छाओ को भी पूरा करता है जैसे रोटी खाने वाला व्यक्ति अगर दक्षिण के पडौसी के यहां निमंत्रण मे जाता है तो उसे दौसा और सांभर का स्वाद पता लगता है या महाराष्ट्र के पडौसी के यहां जाने पर उसे भाखरे खाने को मिलते है गुजराती के यहां जाने पर खम्मण ढोकले भी खाने को मिलते है,मालवा के पडौसी के यहां जाने पर हींग के बघार वाली सब्जी भी खाने को मिलती है। इसके अलावा भी कई प्रकार के खाने अलग से बनाये जाते है उसके लिये एक दूसरे पडौसी के प्रति सद्भावना भी रखते है कि आया हुआ मेहमान कभी यह न कह बैठे कि वे जिसके घर गये थे उनके पडौसी कुछ भी ख्याल रखना नही जानते थे या उनके यहां भोजन बनाने मे कोताही की जाती थी या लोभी थे खिलाने मे भेद रखते थे,अगर उनके घर के आसपास कोई मेहमान आजाता तो उनके घर के बच्चे भी यही मानने लगते थे कि अब तो एक दिन उनके घर पर भी गहमागहमी हो जायेगी और वे भी उस गहमागहमी मे अपने को उन पकवानो का स्वाद लेने से नही चूकेंगे।
मेहमान जब घर मे आते है तो बच्चो से उनकी जानपहिचान होती है बच्चे अपने अपने स्वभाव के अनुसार उन मेहमानो से अपनी अपनी भावना को व्यक्त करते है कोई अच्छी कविता को सुनाना जानता है तो कोई चुटकुले ही सुनाना जानता है कोई केवल हंसना ही जानता है तो कोई अपनी व्यथा को बताने मे ही अपनी सीमा को संकुचित रखता है। कहावत भी सही है कि जब किसी के घर की हालत को जानना हो तो बच्चे उस घर की हालत को बहुत ही ठीक तरह से उसी प्रकार से बता देते है जैसे किसी लडकी के लिये लडका देखना है तो उसके पडौस के नाई धोबी और पंडित से घर का पूरा राज पता किया जा सकता है जैसे नाई के यहां घर के पुरुष दाढी बाल आदि बनवाने जाते है उस समय सब अपने अपने बारे मे कोई न कोई बात करता रहता है नाई को सभी के घरो की हालत का पता चलता है कोई नाई से सुबह सुबह ही झगडा कर लेता है कि जरा सी मूंछ छांटने का दस रुपया ले लिया तो कोई दस की जगह पर पन्द्रह देकर इसलिये चला जाता है कि नाई का काम तो लोगो की सेवा ही करना है और कोई जानना भी चाहेगा तो नाई बढचढ कर उस दस रुपये देने वाले की और पन्द्रह रुपये देने वाले की हालत को कैसे बतायेगा यह तो बाद मे ही पता चलेगा इसके अलावा हर घर से प्रेस होने के लिये धुलने के लिये और कपडे की तीमारदारी करने के लिये कपडा धोबी की दुकान पर भी जाता है जब धोबी को यह भी पता होता है कि एक कपडा कितने दिनो से उसके पास धुलने के लिये आ रहा है अगर देर से आता है तो उसे पता होता है कि धुलने के लिये पैसे नही है और जल्दी जल्दी आता है तो उसे पता होता है कि कपडे बनवाने के लिये पैसे नही है इसलिये एक ही कपडा जल्दी जल्दी प्रेस होने के लिये या धुलने के लिये आता है इसके अलावा भी कपडे की क्वालिटी कैसी है इस बात का पता भी धोबी को ही होता है अलावा लोगो को इस बात की जानकारी नही होती है।
जब मुहल्ले मे रहा जायेगा तो किसी न किसी बात पर झगडा भी होगा और जब झगडा होगा तो उसे निबटाने के लिये समझदार लोग अपनी अपनी तरह से समझायस भी करेंगे,जैसे रात को काम से लौटने के बाद पास की शराब की दुकान पर दो पडौसी मिल जाते है और पहले तो हाफ़ हाफ़ की कहकर एक दूसरे के पैसो की पूर्ति करते है किसी एकान्त स्थान पर कोई नही है को देखकर उस पौवे को पी लिया जाता है मूंगफ़ली आदि मिल गयी तो ठीक है नही मिली तो कोई बात नही,शुरुर के आने से अपनी अपनी बात को कहना चालू कर देते है और जब बाते की जाती है तो मुहल्ले के प्रति किसी न किसी बात से आपसी सामजस्य भी बिगड जाता है और जैसे ही सामजस्य बिगडता है लोग आपस मे गाली गलौज या मारपीट भी कर लेते है जो अन्न एक ने खाया है वही अन्न दूसरे ने भी खाया है कम कोई किसी से नही पडता है बात दो परिवारो के आपसी भिडने तक आजाती है रात को हो सकता है कि लाठी डंडे की जगह पर क्रिकेट खेलने वाले बल्ले ही काम आ रहे हो,लेकिन यह भी पता नही होता है कि किसके लग रही है और कौन जख्मी हो रहा होता है वहां तो आन बान शान तीनो ही दिखाई देती है अगर देखने के लिये कोई पडौसी आते है तो ठीक है अन्यथा नगर निगम की लाइट वैसे दिन मे चलती रहे लेकिन रात को जरूर बन्द हो जाती है उस लाइट मे किसी का चेहरा तो दिखाई नही देता है,सुबह को जब नशा दूर होता है तो एक दूसरे की गल्ती को मानते हुये एक दूसरे के घर पर भी जाना पडता है फ़िर घर की औरते ही रह जाती है कारण आदमी तो काम पर चले जाते है और घर की औरतो को लडको को समझाना पडता है कि कोई बात नही जो हुआ उसे भूल जाओ एक छोटा बन जाता है या तो हाथ जोड लेता है या यह कहकर कि तू छोटा था वह उम्र मे बडा था पीट लिया कोई बात नही अब शैतानी नही करना और न ही शराब पीकर लडाई करना। अक्सर देखा जाता है कि कहीं पर भी लडाई झगडा हो लेकिन औरते और बच्चे अपनी अपनी तरह से देखने की कोशिश करते है इसका भी एक कारण तो समझ मे आया कि उन्हे या तो एक दूसरे की ताकत को देखने मे मजा आता है वैसे टीवी शो मे उन्हे पता होता है कि लडाई कैसे होती है लेकिन वह लडाई जब हकीकत की हो तो और ही बात है बच्चे लडाई के बाद यह कहते देखे जाते है कि कैसे हाथ घुमा घुमाकर बैट को चला रहा था उसकी खोपडी मे बैट का पूरा हिस्सा नही पडा था नही तो राम नाम सत्य हो जाती। यह बात केवल आपसी समझौते से दूर हो जाती है अन्यथा अन्य स्थानो पर तो जरा सी तू तू मै मै मे पुलिस का सौ नम्बर घुमा दिया जाता है पुलिस आती है दोनो पक्षो से थोडा बहुत लेकर राजीनामा करवा दिया जाता है।

मौके की तलाश ! यानी मौकापरस्ती.

सम्मिलित परिवार मे गृहणी को फ़ुर्सत घरेलू कामो से नही मिल पाती है,उसे मौके की तलास होती है कि वह काम के बीच मे अपने बच्चे को सम्भाल ले.आफ़िस में काम करने के समय मे आफ़िसर को मौके की तलास होती है कि मौका मिले तो वह बाजार से अपनी घर की वस्तुओं को खरीद कर घर रख दे,या अस्पताल मे भर्ती मरीज को देखकर आजाये। राजनेता को मौके की तलास होती है कि विरोधी जिस दिन किसी अपने काम मे व्यस्त हो उसी दिन किसी योजना को शुरु कर दिया जाये,जिससे विरोधी अपनी विरोधी गति विधि को प्रकाशित नही कर पाये। छुट्टी के दिन दुकानदार को मौके की तलास होती है कि सभी आसपास की दुकाने बन्द होनेके बाद वह अपनी दुकान को खोलकर अपने सामान को अधिक से अधिक बेच ले। धार्मिक स्थान पर होने वाले उत्सव मे चलते फ़िरते दुकानदारो को मौके की तलास होती है कि वह भी जुडने वाली भीड में अपनी दुकानदारी को चलाकर धन को कमा ले। बस के अन्दर जेबकट को मौके की तलास होती है कि जैसे ही यात्री किसी प्रकार की अन्य क्रिया मे उलझ जाये उसकी जेब साफ़ करने का काम पूरा हो सके। बाज को मौके की तलास होती है कि पक्षी जैसे ही किसी असुरक्षित स्थान पर बैठे उसपर झपट्टा मार कर उसे मारकर अपनी भूख को पूरा किया जा सके। चोर को मौके की तलास होती है कि रात को घर के लोग गहरी नींद मे सो रहे हो उसी समय घर मे चोरी करने का काम पूरा हो सके। अखबार मे छपी खबर को या उचित सामग्री को टीपने के लिये मौके की तलास होती है कि जैसे ही किसी विषय पर कोई बात छपे उसे टीप कर अपने काम को पूरा किया जा सके। थकान होने पर काम करने वाले को मौके की तलास होती है कि जैसे ही मालिक की नजर इधर उधर हो वह थोडा सा आराम कर सके। सडक पर लगे जाम मे मौके की तलास होती है कि जैसे ही जरा सी जगह मिले खुद जाम से बाहर जा सके। परीक्षा मे परीक्षा को देने वाले परीक्षार्थी को मौके की तलास होती है कि परीक्षक की नजर किस प्रकार से बचाकर नकल को किया जा सके। बिल्ली को मौके की तलास होती है कि जैसे ही गृहणी की नजर चूके या रसोई का दरवाजा खुला मिले वह दूध पर अपना अधिकार जमाकर क्षुधा शांत कर सके। साधारण भाषा मे यह सब बाते मौकपरस्ती के अन्दर आती है। सीमा पर भी यह मौका परस्ती देखने को मिलती है,कानून मे भी मौकापरस्ती देखने को मिलती है शहर मे भी मौका परस्ती देखने को मिलती है गांव मे भी मौका परस्ती देखने को मिलती है,घर के अन्दर और मन के अन्दर तक मौकपरस्ती देखने को मिलती है। अगर सही रूप मे देखा जाये तो यह मौकापरस्ती हर व्यक्ति जीव जानवर पक्षी किसी के अन्दर भी मिल सकती है। आखिर मे यह मौकापरस्ती कैसे काम करती है ? इसे अपने को सफ़ल होने के लिये कौन से कारण होते है? इस बात को समझने के लिये इस संसार में एक ही कारण है,जो अक्समात ही पैदा होता है और उस कारण के पैदा होने के साथ ही मौकापरस्त लोग अपनी चाल मे सफ़ल हो जाते है। कितने ही लोग जीव जन्तु अपने जीवन को मौकापरस्ती से ही निकाल रहे है।
मौकापरस्ती से अपना काम निकालने की कला केतु के द्वरा पैदा की जाती है,और मौकापरस्ती मे हानि उठाने का कारण राहु पैदा करता है। भीड में जब व्यक्ति घिर जाता है,उस समय व्यक्ति को भीड से निकल कर अपने काम को करने का भूत सवार होता है,उसे अपने सामान जेब आदि का ख्याल नही रहता है,यह एक प्रकार से एक नशा होता है उस नशे के अन्दर सावधानी के हटते ही जेब कट को मौका मिल जाता है और अपनी कला से वह जेब को साफ़ कर जाता है,जब व्यक्ति उस नशे से दूर होकर अपनी सम्भाल करता है उसी समय वह शोर मचाने लगता है,यानी जो भूला सो भटका। भुलाने वाला राहु और भटकाने वाला केतु। चार लोग एक साथ कही गये थे,तीन लोग वापस आ गये एक नही आया तो प्रकृति का कानून कहता है कि पूंछा उन तीन लोगो से ही जायेगा कि चौथा कहां है। लेकिन कभी कभी यह भी हो जाता है कि उन तीन को भी पता नही लगता है आखिर वह चौथा कहां पर गायब हो गया। यह बात उस चौथे के साथ प्रस्तुत करने वाली राहु की गति होती है और बाकी के तीन को केतु का कारण बनकर अदालत से लेकर समाज व्यवहार तक मे प्रताणित होना पडता है,जब तक उस चौथे की खोज पूरी नही होजाती है।

एक करोड बनाम नौ करोड

कभी राजनीति वाली बात आती है तो धरती की सीमाओं को बांट कर देशवाद फ़िर प्रान्त की बात आती है तो प्रान्तवाद फ़िर जिलावाद फ़िर तहसीलवाद ब्लाकवाद शहर है तो मुहल्लावाद और घर के अन्दर हिस्सावाद मेरे ख्याल से सृष्टि के शुरु होने से वाद का चलन शुरु हो गया होगा। इस वाद के कारण ही आज हर आदमी के अन्दर कोई न कोई वाद का चलना पाया जाता है। यह वाद और कोई नही चलाता है बल्कि हमारे अन्दर के बैठे मुफ़्तखोर ही इस वाद का रूप प्रकट करते है। हमारे शरीर के अन्दर हमारी कुल दस करोड कोशिकाओं ही अपनी कोशिकायें होती है बाकी की नौ करोड कोशिकायें मुफ़्तखोर कोशिकाओं के रूप में हमारे शरीर मे अपना निवास करती है। जब भी उनकी चलने लगती है तो अपनी खुद की कोशिकाओं को अपनी मानसिक स्थिति को  चलान से मजबूर कर देती है और खुद की चलाने लगती है उसी समय से दिमाग वाद को प्रकट करने लगता है। इस वाद के कारण ही शरीर कई प्रकार के विवादों में फ़ंस कर दुख प्राप्त करने लगता है और हम यह कहने लगते है कि यह आखिर में वाद आया कहां से। हमने अपने को हर प्रकार से इन मुफ़्तखोरों के चंगुल में फ़ंस कर बांध रखा है। कभी हम अपने धर्म में बंध गये है,हमे पता होता है कि हम इस संसार में आये है और जैसे हमारे से पहले आने वाले चले गये है और हमे भी चले जाना है लेकिन यह मुफ़्तखोर हमें अहम से पूर्ण कर देते है और हमे हमारे मुख्य उद्देश्य से भटकाकर दूर कर देते है,इसके साथ ही हमारे अन्दर एक प्रकार का बंधन पैदा हो जाता है और उस बंधन के कारण हम जो हमें नही करना होता है उसे भी करने लगते है और जो करना है उसे भूल जाते है। बात भी सही है कि हमारे से नौ गुने परजीवी हमारा ही खाकर हमे ही भटकाने की नीयत से कुछ भी कर सकते है और जब दस लोग एक साथ बैठ जाते है और उनके अन्दर कोई अनीति वाली बात होती है तो नौ एक को बरबाद कर अपनी संख्या को नौ में ही रखना चाहते है।
यह सीमा विवाद भी एक तरह से व्यक्ति के लिये फ़लदायी भी है और नुकसान दायक भी है। इस कारण को वैसे ही समझा जा सकता है जैसे सूर्य के सामने रहकर प्रकाश को नही समझ पाते है लेकिन जैसे ही सूर्य छुपता है प्रकाश का महत्व समझ मे आजाता है। सूर्य के छुपने के बाद हम प्रकाश की व्यवस्था करते है और जहां तक प्रकाश जाता है वहां तक का तो सब कुछ समझ मे आता है लेकिन जहां अन्धेरा होता है वह स्थान केवल अंदाज से ही समझा जा सकता है। अन्धेरे मे अन्धेरे को नही देखा जा सकता है तो प्रकाश मे प्रकाश को नही देखा जा सकता है। कम और अधिक प्रकाश तथा अन्धेरे को बदलाव के रूप मे देखते है और वही बदलाव हमे रंगो के रूप मे समझ मे आता है। यह रंग की परिभाषा के रूप मे समझा जा सकता है। आपके दिमाग में शायद इस बात का ज्ञान नही था कि रंग की परिभाषा क्या होती है तो आज भदौरियाजी ने आपके सामने रंग की परिभाषा का रूप भी रख दिया है। यह रंग की परिभाषा ही वाद का कारक है और इस वाद को समझने के लिये मानसिक विवाद की भी जरूरत है। जब तक प्रकाश में अन्धेरे का कारण नही होता है आपको प्रत्यक्ष दर्शन भी नही हो सकता है जैसे आप इस ब्लाग में जो भी पढ रहे है वह प्रकाश में अन्धेरे की उपस्थिति से ही सम्भव है अगर पूरा प्रकाश ही प्रयोग में लाया जाता है तो आप स्क्रीन को साफ़ और क्लीयर ही देख सकते थे अक्षर जो काले रंग का लिखा हुआ है वह आपको दिखाई ही नही देता,तो समझ मे आगया होगा कि प्रकाश में अन्धेरे का और अन्धेरे मे प्रकाश का कितना महत्व है। अब आपक अन्दर यह भी प्रश्न उत्पन्न हो रहा होगा कि आखिर मे इस प्रकाश और अन्धेरे का महत्व सीमा विवाद और घर के मुफ़्त खोरो से कैसे जुडा है।
जो लोग अपने को उन्नत मानते है और अपने समाझ धर्म मर्यादा को अपनी सीमा तक सुरक्षित रखना चाहते है वे नही चाहते है कि उनकी मर्यादा धर्म और समाज के साथ उनके खुद के कानून जिनके अन्दर वे बंधे है और बंधे रहकर ही जीना चाहते है उन्हे कोई आकर उनके बन्धन को खोले और वे फ़्री होकर कुछ और देख सकें,इसलिये लोग अपनी अपनी सीमा में बंधे रहकर जीने के लिये मजबूर है और वे यह भी चाहते है कि वे केवल अपनी बंधी हुयी दुनिया में ही रहें उन्हे कोई किसी प्रकार से छेडे भी नही। यही कारण सीधा सीमा विवाद के कारण पैदा हो जाता है। हमारे शरीर मे एक करोड तत्व जो कोशिकाओं के रूप मे उपस्थित होते है वह हमारे रूप को रंग को हाथ पैर और दिमाग के संचालन का काम तो सभी की तरह से करते है और पैदा होना आगे की सन्तति को पैदा करना पेट भरना और शरीर को चलाना यह सभी बाते उन एक करोड कोशिकाओं की बदौलत एक सा चलता है लेकिन नौ करोड जो मुफ़्त खोर हमारे अन्दर निवास करते है वे नही चाहते है कि उन्हे किसी अन्य प्रकार से छेडा जाये। कारण अगर उन नौ करोड को छेड दिया जाता है तो उनके अन्दर बदलाव भी शुरु हो सकता है और आदमी को बजाय बंधन में जीने के उसे खुलकर भी जीना पड सकता है। यह उसी प्रकार का बंधन माना जाता है जैसे एक पति अगर विदेश मे नौकरी करने के लिये जाना चाहता है तो उसकी पत्नी को डर लगता है कि उसका पति अगर विदेश मे चला गया तो उसके अन्दर विदेश के रीति रिवाज और कारण पैदा हो जायेंगे वह अपने परिवार को भूल जायेगा और वह वापस अपने देश को वापस नही आयेगा। इस कारण से पति को पत्नी विदेश नही भेजना चाहती है। यही प्रकार पति के अन्दर भी देखा जाता है कि अगर पत्नी को अकेला छोड दिया गया तो कोई दूसरा उसकी पत्नी को ले जायेगा और वह अपनी पत्नी को दूसरे के पास कैसे देख सकता है। जबकि उसे यह भी पता है कि पत्नी के अन्दर भी उतना ही दिमाग है जितना उसके अन्दर है,अगर पत्नी के शरीर मे मुफ़्त खोरों की चलती है तो पत्नी अपने एक करोड की सहायता नही ले पायेगी और बाकी के नौ करोड के चक्कर में फ़ंस कर अपने को दूर ले जाकर अपने नाम निशान और औकात को भुला देगी। अगर पत्नी के अन्दर वह एक करोड सबल है और वह मजबूत है तो किसी प्रकार से उसकी पत्नी उन नौ करोड को भी झुठलाकर अपने ही घर मे रहेगी।

धर्म स्थान और उनका महत्व

हर राशि की अपनी अपनी उन्नति की दिशा है और हर दिशा अपना अपना महत्व रखती है। मेष राशि अपनी उन्नति पूर्व दिशा मे करती है वृष राशि अपनी उन्नति वायव्य दिशा मे करती है मिथुन भी अपनी उन्नति वायव्य मे ही कर पाती है कर्क राशि उत्तर दिशा मे उन्नति के लिये मानी जाती है,सिंह राशि पूर्व के लिये कन्या राशि उत्तर के लिये तुला राशि पश्चिम के लिये वृश्चिक राशि नैऋत्य के लिये धनु राशि अग्नि के लिये मकर राशि दक्षिण के लिये कुम्भ राशि अग्नि कोण के लिये और मेन राशि भी अग्नि कोण के लिये उन्नति के लिये मानी गयी है. इसी प्रकार से धर्म स्थान भी हर राशि के लिये अपने अपने महत्व और उन्नति देने तथा पूजा पाठ के फ़लो के लिये भारत मे स्थापित किये गये है.उत्तर दिशा मे कुबेर का स्थान माना गया है और बद्रीनाथ वृष राशि केदार नाथ मिथुन राशि वालो के लिये उत्तम भाग्य को देने वाले है,जगन्नाथ पुरी मकर राशि वालो के लिये रामेश्वरम तुला राशि वालो के लिये द्वारका नाथ मीन राशि वालो के लिये सोमनाथ कुम्भ राशि वालो के लिये उत्तम फ़ल देने वाले माने गये है.बारह शिवलिंग अपनी अपनी राशि के अनुसार स्थापित किये गये है.चौसठ योगिनी आठ दिशाओं के चार चार भाग बनाकर स्थापित की गयी है.एक सौ आठ शक्ति पीठ सत्ताइस नक्षत्रों के अनुसार चारो दिशाओं में स्थापित किये गये है.राहु के लिये केवल सिर से युक्त भगवान की पूजा की जाती है जैसे बर्बरीक महाराज को श्याम बाबा के नाम से और केतु के लिये गणेशजी की पूजा को मान्यता दी गयी है.चन्द्र के लिये शिव स्थान तथा चन्द्रमा की कलाओं के अनुसार (५४०००) शिव रूपों का स्थापन किया गया है,यह कलायें भारत मे कुछ ही बाकी रह गयी है अन्य का काल के अनुरूप लुप्त हो जाना भी मिलता है.बारह रवि बारह अर्क बारह भास्कर बारह दिनकर बारह तमारि और बारह मार्तण्ड बारह प्रभारि रूप में शिव स्थान है.

दक्षिण मुखी मकान कितना शुभ और कितना अशुभ

वास्तु जीवन को प्रभावित करता है यह कई प्रकार से देखने मे भी आता है और समझने मे भी आता है.लेकिन हर दिशा हर व्यक्ति के लिये अशुभ हो यह समझ मे नही आता है.अक्सर लोगो को कहते सुना है कि दक्षिण मुखी मकान अशुभ होता है और उसी जगह पर पूर्व फ़ेसिंग और उत्तर फ़ेसिंग मकान की कीमत अच्छी मिल जाती है लेकिन दक्षिण मुखी मकान का पूरा मूल्य नही मिल पाता है.आखिर ऐसा क्या है जो दक्षिण मुखी मकान से लोग घबडाते है कुछ बिन्दुओं को समझने के बाद और गहरे रूप मे देखने के बाद जो समझ मे आया है वह इस प्रकार से है:-

  • दक्षिण मुखी मकान में दोपहर का सूर्य अपनी रश्मियों को प्रसारित करता है इन रश्मियों को वही सहन कर सकता है जो दिमाग शरीर और भौतिकता मे बलवान होता है.कारण जो गर्मी और ऊष्मा सूर्य से प्रसारित होती है वह साधारण लोग हजम नही कर पाते है.
  • पुलिस सेना तकनीके क्षेत्र के लोग डाक्टर दवाई बनाने वाले होटल और आग वाला काम करने वाले मिठाई बनाने वाले दक्षिण मुखी मकान मे सफ़ल हो जाते है और उनकी बराबरी का कार्य अलावा दिशाओ वाले नही कर पाते है.
  • तकनीकी दिमाग का होना और गर्म दिमाग का होना इसी दिशा मे रहने वाले लोगों के पास होता है,अधिकतर देह बल का प्रयोग करने वाले और शरीर को धन औकात और नाम के लिये प्रयोग करने वाले लोग इसी दिशा को पसन्द करते है.
  • जो लोग विपरीत कार्यों से जुडे होते है वे उपरोक्त कारणो के कारण परेशान होते है,पूजा घर भी दक्षिण फ़ेस वाले सही माने गये है अगर उन घरो में हवन अखण्ड ज्योति को जलाकर रखा गया है.
  • अगर दक्षिण मुखी मकान का दरवाजा लाल रंग का है तो व्यक्ति आराम से रह सकता है.
  • लाल रंग के स्वास्तिक भी इस दिशा के दरवाजे वाले मकानो के लिये शुभ होते है.
  • मिर्च मशाले के व्यवसाय वाले इस दिशा के दरवाजों के मकान मे रहने के बाद अक्सर पनपते देखे गये है.
  • कर्जा देने वाले बैंकिंग का काम करने वाले और ब्याज तथा किराये से रहने वाले लोग इस दिशा के मकानो से हमेशा दुखी देखे गये है उनके धन को या सम्मान को शरीर को किसी न किसी प्रकार से आघात ही लगते देखे गये है.
  • अगर दक्षिण मुखी मकान के आगे टी क्रास भी है तो अक्सर मकान मालिक और किरायेदार के बीच मे लम्बी लडाई भी होती देखी गयी है,अक्सर मकान मालिक बाहर भटकता है और किरायेदार ऐश करता है.अगर इस घर मे कोई लडका मंगलवार के दिन पैदा हो जाये तो किरायेदार घर छोड कर भागने में ही अपनी भलाई समझते है.
  • आफ़तो की दिशा से मानी जाने वाली यह दिशा माता काली की दिशा बतायी जाती है लेकिन मंगल के सम्मुख होने से मंगला काली की दिशा भी यही कही गयी है.

बुध केतु + शुक्र राहु = मीडिया

कल्पना भाभी की आदत है कि वे मुहल्ले मे किसी की भी बात को या तो इतना उछाल देतीं है कि सामने वाला मुहल्ला छोड कर भाग जाता है,या बात को इतनी जोर से बना देती है कि अजनबी भी आकर मुहल्ले मे राज करने लगता है। उनकी बात में इतनी दम है कि अमीर गरीब बूढा जवान स्त्री पुरुष सभी उनकी बातों को बडे गौर से सुनते है और बात को सुनकर अमल भी करते है। उनके बात करने में एक बात और होती है कि वे अपने साथ बात करने की गवाही जरूर रखती है,अगर कहीं गवाही नही मिलती है तो -"भगवान की सौगंध" उनके साथ जरूर चलती है। बात करने मे उनके अन्दर बुजुर्गो के साथ सम्मान होता है,जवान पुरुषों के साथ मजाक होती है,स्त्रियों में बडी बूढी महिलाओं के साथ पैर दबाकर सलीके से सिर पर पल्ला लेकर बात करने की तहजीब होती है,बराबर की महिलाओं से कटाक्ष भरे सैन मटक्के होते है और बच्चों के साथ उनका सलीका इतना मधुर होता है कि कोई भी बच्चा उनके आने के बाद अपनी अम्मा की गोद छोड कर उनकी गोद मे जा बैठता है।

कल्पना भाभी के पतिदेव किसी कचहरी मे बाबू है,जितनी कल्पना भाभी बात करती है उतने ही वे चुप रहते है,जितना कल्पना भाभी आसपास के माहौल के प्रति सजग रहती है उतना ही वे अपने मे ही मस्त रहने वाले आदमी है,उनके पास तीन लडकियां ही सन्तान के रूप मे है,जब पति देव नौकरी पर चले जाते है,लडकियां घर के काम को निपटा लेती है,घर आकर कल्पना भाभी अपनी लडकियों से भी मुहल्ले की बातों को बताती है जिससे उनकी लडकियां भी आसपास की राजनीति घरों के माहौल तथा बुजुर्ग जवान बच्चों के बारे मे पूरी जानकारी रखती है,समय पर जब कल्पना भाभी किसी मुद्दे को लेकर बात करते समय भूलती है तो उनकी लडकियां उन्हे याद दिला देती है,उन्हे इस बात से बहुत खुशी होती है कि उनकी लडकियां अपनी याददास्त को बहुत अच्छी तरह से कायम रखती है। कल्पना भाभी को गाने बजाने नाचने में भी ईश्वर ने अच्छी योग्यता दे रखी है,किसी भी उत्सव में अगर कल्पना भाभी नही है तो वह उत्सव फ़ीका सा ही लगता है,किसी की रसोई में अगर कल्पना भाभी का हस्तक्षेप नही है तो वह रसोई भी बिना मिर्च मशाले के मानी जा सकती है,किसी प्रतियोगिता में अगर कल्पना भाभी अपनी हाजिरी मुख्य सदस्य के रूप में नही रखती है तो वह मुहल्ले की प्रतियोगिता भी रूखी रूखी सी लगती है।

मुहल्ले की राजनीति में कल्पना भाभी को किसी पद से मतलब नही है। वे अपनी उपस्थिति से मुहल्ले के अध्यक्ष के पद के लिये जिसे भी मनोनीत कर देती है वही बिना किसी हील हुज्जत के अध्यक्ष बन जाता है। अगर उन्हे किसी बात से दिक्कत होती है तो वे जरा सी सरगर्मी फ़ैला कर अध्यक्ष पद वाले व्यक्ति को हटाकर दूसरे व्यक्ति को भी चुनने मे अपनी योग्यता को दिखा सकती है। उनके अन्दर यह कला भी है कि उनके पति देव तो जो सैलरी लाते है वह तो उनके कपडों की धुलाई में ही खर्च हो जाती है। बाकी की कमाई का स्त्रोत आजतक किसी मुहल्ले वाले को पता नही है। हाँ इतना जरूर है कि अगर किसी को कैसा भी काम पडता है तो कल्पना भाभी अपनी जान पहिचान और राजनीति से किसी के भी काम को पूरा करवा देती है। कुछ समय पहले की ही बात है शुक्ला जी को मुहल्ले के बारे मे राजनीति करने की बहुत बुरी आदत थी,कल्पना भाभी ने कई बार उन्हे प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से मना भी किया लेकिन नही माने। कल्पना भाभी के पास श्रीवास्तव जी का आना जाना था,उन्होने पता नही क्या गुड कल्पना भाभी को खिला दिया कि श्रीवास्तव जी तो अध्यक्ष बन गये और शुक्ला जी मकान बेच कर चले गये।

कल्पना भाभी को वैसे तो सभी जगह जाने का शौक है लेकिन उन्हे पता नही अपने वास्तविक धर्म से कितनी अरुचि है। कहीं भी सत्संग होता है तो वे जाती जरूर है और केवल भगवान की सजी हुयी झांकी की सराहना करती है किसने कितने भाव से कीर्तन को गाया,किसने कितने अच्छी तरह से अपने नृत्य को प्रस्तुत किया,कौन सा गीत किस फ़िल्मी गीत की तर्ज पर था,यह सब बातें वे कर सकती है लेकिन भगवान के प्रति श्रद्धा के बारे मे उनसे पूंछा जाये तो वे केवल यही जबाब देती है कि यह सब अपनी अपनी मान्यता है,जितना काम करोगे उतना ही कमा लोगे अपने आप तो आ नही जायेगा। किसी की शादी समारोह मे वे अपने आशीर्वाद को केवल आने वाले व्यवहार की रकम से जोडती है,लडका या लडकी के प्रति उनकी यही भावना रहती है कि आज के जमाने के अनुसार अगर लडका लडकी नहे चले तो कोई बात नही तलाक ले कर दूसरी शादी करने मे अच्छा है। कल्पना भाभी को अपनी हिन्दी भाषा बोलने मे कभी कभी तकलीफ़ होती है वे अपनी भाषा को बोलने मे अक्सर तभी तकलीफ़ महसूस करती है जब वहां सभी हिन्दी बोलने वाले हों तो वे अपनी बात को अपना इम्प्रेसन जमानेके लिये विदेशी भाषाओं में करने लगती है। जो लोग पहले से जाकर कल्पना भाभी को न्यौता देकर आते है उन्हे यह अपने नजरिये से बिलकुल सही देखती है,या जो लोग ऊंची पहुंच रखने वाले होते है अच्छे पदो पर स्थिति होते है उनके लिये कल्पना भाभी सभी को एक तरफ़ करने के बाद उनकी प्रसंशा जरूर करती है। उनके सामने धन और मान सम्मान की मर्यादा बहुत अच्छी है,अगर कोई बुद्धिमान है और उसके पास धन या अपने को प्रसिद्ध करने का तरीका नही है तो कल्पना भाभी की आदत है कि उसे किसी न किसी प्रकार से नीचा दिखा सकती है और जो कुछ नही जानता है केवल कल्पना भाभी की जी हुजूरी करता रहता है उसे कल्पना भाभी आसमान की ऊंचाइयों मे पहुंचाने की हिम्मत रखती है,उसके बारे कितने ही प्रकार के वक्तव्य वे अपने कथन मे लाती है कि एक प्रकार से वह ही सब मे सर्वोपरि है।

जब कभी चुनाव होते है तो राजनीतिक लोग सबसे पहले कल्पना भाभी को ही पुकारते है। उनके घर पर आने जाने वाले लोगों की भीड इकट्ठी हो जाती है और जो भी कल्पना भाभी को खुश करना जानता है उसे ही मुहल्ले के पूरे वोट मिलते है,जो भी उस समय कल्पना भाभी के सामने आता है,उसके सामने ही कल्पना भाभी को पहले गुहारने वाले के लिये शब्दो का जंजाल फ़ैलना शुरु हो जाता है। जो भी उस समय कल्पना भाभी की बात को सुनता है वह कुछ समय के लिये तो सोचने लगता है कि आखिर मे कल्पना भाभी को क्या हो गया जो इतने बुरे आदमी के लिये कल्पना भाभी इतने अच्छे शब्दो का प्रयोग कर रही है और जो वास्तव मे अच्छा आदमी है उसके लिये भी वे कोई खराब बात नही कहती है केवल थोडा बहुत जिक्र कर देती है और जिक्र भी इस प्रकार का होता है कि सामने वाले को बुरा भी नही लगे और सामने वाले को जिक्र करने से कोई लाभ भी नही हो। कल्पना भाभी की बात का जबाब देने के लिये किसी मे भी हिम्मत नही है,कारण पता नही कल्पना भाभी का खोपडा घूम जाये और कल्पना भाभी किसे कहां किस प्रकार से पहुंचा दें।

हमारे अनुसार हर मुहल्ले मे हर गांव में हर शहर में हर प्रान्त मे हर देश मे कितनी ही कल्पना भाभियां है जो अपनी पहुँच बनाने के लिये अपने अपने अनुसार केवल अपने लाभ और अपनी पहिचान बनाने के लिये प्रयास रत है। कोई कल्पना भाभी बनकर अखबार के रूप मे सामने है कोई कल्पना भाभी बनकर चैनल के रूप मे है,कोई कल्पना भाभी बनकर कम्पयूटर पर बेव साइट के रूप मे है,इन कल्पना भाभी को पहिचानने के लिये खास मेहनत करने की जरूरत नही पडती है। हमारी ज्योतिष की भाषा में कल्पना करना और मूर्त रूप देकर उसे शब्दो मे द्रश्य मे बनावटी रूप से प्रकाशित करने में कल्पना भाभी को शुक्र राहु और उन्हे जो सूचना देने का काम करते है उन्हे बुध केतु के रूप मे देखा जाता है,कल्पना भाभी की तीनो लडकियां जो दत्तक संतान के रूप मे है,वे किसी दिन अपने अपने घर चली जायेंगी,उनसे आगे के जीवन मे कल्पना भाभी का कोई सरोकार नही होगा,जैसे किसी अखबार मे चैनल मे खबरो को लाने वाले रिपोर्टर होते है,अपने अपने समय मे आते है अपने अनुसार अपनी अपनी औकात को दिखाकर क्या अच्छा है क्या बुरा है का रूप नही समझ कर लोगों को क्या अच्छा लग सकता है उसे ही बताने का उद्देश्य रखकर कहते है और चले जाते है।

शुद्ध साधना मन की साधना

शरीर रूपी ब्रह्माण्ड की तीन वृत्तियां है,परा,विराट और अपरा। परा ह्रदय से ऊपर का भाग कहा जाता है,विराट ह्रदय से नाभि पर्यंत का भाग कहा जाता है और अपरा नाभि से नीचे का भाग कहा जाता है। चित्त वृत्ति की उपस्थिति इन तीनो ब्रह्माण्डो मे पायी जाती है,तथा द्रश्य वृत्ति केवल परा ब्रह्माण्ड के अन्तर्गत ही आती है। चित्त वृत्ति के स्थिर रहने पर देखना श्रवण करना मनन करना सूंघना आदि सूक्ष्म रूप से महसूस किया जा सकता है,द्रश्य वृत्ति को अगर चित्त वृत्ति मे शामिल कर लिया जाये तो कर्म वृत्ति का उदय होना शुरु हो जाता है। अगर चित्त वृत्ति और द्रश्य वृत्ति मे भिन्नता पैदा हो जाती है तो कर्म वृत्ति का नही होना माना जाता है। जिसे साधारण भाषा मे अनदेखा कहा जाता है। चित्त वृत्ति को साधने की क्रिया को ही साधना के नाम से पुकारा जाता है,और जो अपनी चित्त वृत्ति को साधने मे सफ़ल हो जाते है वही अपने कर्म पथ पर आगे बढते चले जाते है और नाम दाम तथा संसार मे प्रसिद्धि को प्राप्त कर लेते है। चित्त वृत्ति को साधने मे जो रुकावटें आती है,उनमे सबसे बडी बाधा मानसिक भ्रम को मुख्य माना जाता है। उदाहरण के रूप मे बच्चे से अगर माता कहती है वह खिलौना उठाकर ले आओ,उसी समय पिता अगर बच्चे से कह देता है कि पढाई करो,बच्चे के दिमाग मे भ्रम पैदा हो जाता है कि वह खिलौना उठा कर लाये या पढाई करे,इस भ्रम के अन्दर अगर बच्चे से बाद मे पूंछा जाये कि पहले खिलौना उठाकर लायेगा या पढाई करेगा,बच्चा अगर माता से डरता है तो पहले खिलौना उठाकर लायेगा और पिता से डरता है तो माता की बात को अनसुना करने के बाद पढने बैठ जायेगा। इसी प्रकार से अगर किसी को कहा जाये कि अमुक काम को करना है,अमुक को नही,तो मानसिक धारणा के अन्दर उन दोनो कामो को करने के पहले उनके बीच का अर्थ निकालने मे मन लग जायेगा और वही समय मानसिक भ्रम का माना जायेगा। कारण जब समझ मे आयेगा तब तक या तो मना किये गये काम का रूप बदल चुका होगा या बताये गये काम का करना मुनासिब नही हो पायेगा। इसके अलावा एक और बात मानी जाती है कि किसी व्यक्ति से कह दिया जाये कि वह अमुक कार्य को अमुक तरीके से करो,और उसी समय दूसरा व्यक्ति उसी काम को पहले बताये गये व्यक्ति के तरीके से भिन्न हो जाता है तो भी मानसिक भ्रम की उत्पत्ति हो जाती है। इस भ्रम की स्थिति को बच्चो मे तो खेल कूद और मनोरंजन के साधन तथा नई नई चीजों को देखने के रूप मे मानी जाती है जो जिज्ञासा के नाम से जानी जाती है। वही बात अगर युवाओं मे देखी जाये तो उनकी भ्रम वाली स्थिति शादी विवाह करने अपनी नई दुनिया को बसाने तथा एक दूसरे के ज्ञान धन परिवार रहन सहन समाज मे चलने वाले कारणो को समाप्त करने आदि के प्रति भ्रम बनना माना जायेगा,जब व्यक्ति वृद्ध होता है तो उसके दिमाग मे युवाओ को बदलने वाले कारणो का भ्रम बना रहेगा,कि अमुक कार्य से उसे हानि हो सकती है अमुक वस्तु को खाने पीने से उसके अन्दर बुराई पैदा हो सकती है अमुक सम्बन्ध को बनने के बाद उसकी वैवाहिक जिन्दगी मे बरबादी का कारण बन सकता है या अमुक कार्य करने से बडी हानि या किसी को कष्ट भी पहुंच सकता है,इन भ्रमो के अलावा और भी कई प्रकार के भ्रम माने जाते है जो हर व्यक्ति के जीवन मे अपने अपने रूप मे उपस्थित होते है और उन भ्रमो के कारण ही प्रगति के पथ पर लोग या तो गलत रूप से आगे बढ जाते है या फ़िर कार्य मे तमाम बाधाये प्रस्तुत कर लेते है और कार्य पूरा नही हो पाता है उनके द्वारा पहले की गयी मेहनत बरबाद हो जाती है।

ज्योतिष मे इस भ्रम नाम की बीमारी को पैदा करने वाला राहु है।राहु एक छाया ग्रह है जिसका प्रभाव उल्टे रूप मे पडता है। जैसे एक व्यक्ति को जंगल के रास्ते जाना है और उसे कोई पहले बता देता है कि रास्ते मे शेर मिल सकता है। व्यक्ति को भले ही शेर नही मिले लेकिन उसके दिमाग मे शेर का भय पैदा हो जायेगा कि शेर अगर मिल गया तो वह उसे मार भी सकता है या उसके शरीर को क्षति भी पहुंचा सकता है। वह व्यक्ति अपनी सुरक्षा के चक्कर मे अपने दिमाग का प्रयोग करेगा,और अपने को सतर्क करने के बाद ही जंगल का रास्ता तय करेगा। इस सोचने की क्रिया के अन्दर जो मुख्य भाव आया वह मृत्यु का भय,जीवन चलने का नाम है और मृत्यु समाप्ति का नाम है,जीवन का नाम सीधा है तो मृत्यु का नाम उल्टा है। यही राहु का कार्य होता है। उल्टा सोचने के कारण ही लोग अपने लिये सुरक्षा का उपाय करते है,उल्टा सोच कर ही लोग समय पर पढने का कार्य करते है या उल्टा सोच कर ही लोग किसी भी कार्य को समय से पहले करने की सोचते है या अपने जीवन के प्रति सजग रहने की बात करते है। जब इस प्रकार की बाते आती है तो राहु कुंडली मे अच्छी स्थिति मे होता है और जब राहु गलत भाव मे होता है तो वह बजाय सीधे रास्ते जाने के उल्टे रास्ते से जाने के लिये अपनी गति देने लगता है। जैसे कुंडली मे चन्द्रमा के साथ राहु किसी खराब भाव मे है तो वह मन के अन्दर एक छाया सी पैदा करे रहेगा। मन का एक स्थान मे रहना नही हो पायेगा। जब मन का बंटवारा कई स्थानो मे हो जायेगा तो याददास्त पर असर पडेगा। रास्ता चलते हुये जाना कहीं होगा तो पहुंच कहीं जायेंगे। करना कुछ होगा तो करने कुछ लगेंगे। किसी रखी हुयी वस्तु को भूल जायेंगे,या रखी कहीं थी खोजने कहीं लग जायेंगे,इस बीच मे बुराइयां भी बनने लगती है,जैसे वस्तु को आफ़िस मे रखा था और खोजने घर मे लगेंगे,फ़िर जब नही मिलेगी तो तरह तरह की शंकाओं के चलते जो भी पास मे रहा होगा उस पर झूठा आक्षेप लगाया जाने लगेगा। यह स्थिति राहु के भावानुसार मानी जायेगी,जैसे राहु धन स्थान मे है और चन्द्रमा से युति ले रहा है तो पर्स को रखा तो टेबिल की दराज मे आफ़िस में जायेगा और खोजा घर के अन्दर जायेगा,घर के किसी सदस्य पर आक्षेप लगेगा और बुराई अपमान आदि की बाते उस सदस्य के पल्ले पडेंगी। इसी प्रकार से लडके लडकियां जब बडे हो जाते है तो उनके अन्दर बडी शिक्षा मे जाने के बाद एक सोच पैदा हो जाती है कि वे अपने सहपाठी से नीचे क्यों है,उसका सहपाठी तो बडी और लक्जरी गाडी मे आता है,वह पैदल या बस से आता है,उसके पास कोई आजकल का चलने वाला साधन नही है,जबकि उसके साथी सभी साधनो से पूर्ण है। यह भाव अपने ही मन मे लाने के कारण पढाई लिखाई तो एक तरफ़ रखी रह गयी,अपने को और भी नीचे ले जाने के लिये सोच को पैदा कर लिया। मन के अन्दर माता पिता दादा दादी और परिवार को जिम्मेदार मान लिया गया,और उनके प्रति मन के अन्दर एक अजीब सी नफ़रत पैदा हो गयी। यह कारण अष्टम मे राहु के होने से और ग्यारहवे भाव के स्वामी से युति लेने के कारण बन जाती है। इसी प्रकार से जब राहु का गोचर पंचम भाव मे होता है या वह पांचवे भाव मे शुरु से ही बैठा होता है या चन्द्र मंगल की युति धन भाव मे होती है और राहु का स्थान पंचम मे होता है अथवा राहु का प्रभाव पंचम से शुक्र के साथ हो रहा होता है तो व्यक्ति के अन्दर बचपन मे मनोरंजन के साधनो का और वाहन सम्बन्धी कारण पैदा होता है,जवानी मे इश्क का भूत सवार हो जाता है और वह या तो अपने लिये नये नये लोगो पर छा जाने वाले कारण पैदा करने लगता है या अपनी दहसत से लोगो के अन्दर भय को पैदा करना शुरु कर देता है। इसी प्रकार से अन्य भाव मे विराजमान राहु अपनी विचित्रता से उल्टे काम करने के लिये अपना प्रभाव देने लगता है।

कहा जाता है कि नशे के अन्दर क्षत्रिय दाढी वाला बाबा शमशान मे निवास करने वाला पागल जैसा लगने वाला व्यक्ति की बराबरी उसी व्यक्ति से की जा सकती है जो नितांत अकेला बैठा सोचता रहता है,जिसे दिन मे सोचने से फ़ुर्सत नही होती और रात को नींद उससे कोशो दूर होती है। वह जब कभी सो भी जाता है तो स्वप्न भी बहुत ही अजीब अजीब आते है जैसे मुर्दो के बीच मे रहना आसमान मे पानी की तरह से चलना,जंगल बीहड वीराने क्षेत्र मे चलना,खतरनाक जानवर देखना या ऐसा लगना कि वह अक्समात ही नीचे गिरता चला जा रहा है यह एक राहु की सिफ़्त का उदाहरण है जो बारहवे भाव अष्टम भाव या चौथे भाव मे बैठ कर अपनी स्थिति को दर्शाता है। जैसे लोग अपने मन को साधने के लिये शराब का सेवन करते है या राशि के अनुसार जो चौथे भाव मे होती है उसके अनुसार नशे को करने लगते है का फ़ल चौथे राहु के द्वारा देखा जाता है,शमशानी राशि अष्टम मे बैठा राहु जिसे वृश्चिक राशि के नाम से जाना जाता है उसके साथ भी दिमाग का बंटवारा एक साथ कार्यों मे बाहरी खर्चो मे घर के लोगो मे धन के मामले मे तथा मानसिक सोच मे जाने के लिये अपनी एक साथ युति को देता है,इस युति के कारण अक्सर लोग या तो बडा एक्सीडेंट कर लेते है या कोई भयंकर जोखिम को ले लेते है,या फ़िर किसी ऊंचे स्थान से कूद जाते है या वाहन आदि को चलाते समय कहीं जाना होता है कहीं चलते है और अपने साथ साथ दूसरो के लिये भी आफ़त का कारण बन जाते है।

राहु को साधने का तरीका आज के युग के लोग अपने को शराब आदि के कारणो मे ले जाते है कोई नींद की गोली लेता है,कोई अफ़ीम आदि के आदी हो जाते है कोई नशे के विभिन्न कारण अपने मन को साधने के लिये लेना शुरु कर देते है,यह प्रभाव उनके ऊपर इतनी शक्ति से हावी हो जाता है कि यह ईश्वर का दिया हुआ रूप बल शक्ति मन दिमाग सभी बरबाद होने लगते है और जो कार्य यह शरीर अपने परिवेश के अनुसार कर सकता था उससे दूर रखने के बाद अपनी लीला को एक दूसरो पर बोझ के नाम से समाप्त कर लेने मे जल्दबाजी भी करते है। राहु को साधने के लिये सबसे पहले अपनी चित्त वृत्ति को साधना जरूरी है,जब मन रूपी चित्त वृत्ति को साधने की क्षमता पैदा हो जाती है तो शरीर से जो चाहो वही कार्य होना शुरु हो जाता है क्योंकि कार्य को करने के अन्दर कोई अन्य कारण या मन की कोई दूसरी शाखा पैदा नही होती है।

चित्त वृत्ति को साधने के लिये महापुरुषो ने कई उपाय बताये है। पहला उपाय योगात्मक उपाय बताया है। जिसे त्राटक के नाम से जाना जाता है। एक सफ़ेद कागज पर एक सेंटीमीटर का वृत बना लिया जाता है उसे जहां बैठने के बाद कोई बाधा नही पैदा होती है उस स्थान पर ठीक आंखो के सामने वाले स्थान पर चिपका कर दो से तीन फ़ुट की दूरी पर बैठा जाता है,उस वृत को एक टक देखा जाता है उसे देखने के समय मे जो भी मन के अन्दर आने जाने वाले विचार होते है उन्हे दूर रखने का अभ्यास किया जाता है,पहले यह क्रिया एक या दो मिनट से शुरु की जाती है उसके बाद इस क्रिया को एक एक मिनट के अन्तराल से पन्द्रह मिनट तक किया जाता है। इस क्रिया के करने के उपरान्त कभी तो वह वृत आंखो से ओझल हो जाता है कभी कई रूप प्रदर्शित करने लगता है,कभी लाल हो जाता है कभी नीला होने लगता है और कभी बहुत ही चमकदार रूप मे प्रस्तुत होने लगता है। कभी उस वृत के रूप मे अजीब सी दुनिया दिखाई देने लगती है कभी अन्जान से लोग उसी प्रकार से घूमने लगते है जैसे खुली आंखो से बाहर की दुनिया को देखा जाता है। वृत को हमेशा काले रंग से बनाया जाता है। दो से तीन महिनो के अन्दर मन की साधना सामने आने लगती है और जो भी याद किया जाता है पढा जाता है देखा जाता है वह दिमाग मे हमेशा के लिये बैठने लगता है। ध्यान रखना चाहिये कि यह दिन मे एक बार ही किया जाता है,और इस क्रिया को करने के बाद आंखो को ठंडे पानी के छींटे देने के बाद आराम देने की जरूरत होती है,जिसे चश्मा लगा हो या जो शरीर से कमजोर हो या जो नशे का आदी हो उसे यह क्रिया नही करनी चाहिये।

दूसरी क्रिया को करने के लिये किसी एकान्त स्थान मे आरामदायक जगह पर बैठना होता है जहां कोई दिमागी रूप से या शरीर के द्वारा अडचन नही पैदा हो। पालथी मारक बैठने के बाद दोनो आंखो को बन्द करने के बाद नाक के ऊपर अपने ध्यान को रखना पडता है उस समय भी विचारों को आने जाने से रोका जाता है,और धीरे धीरे यह क्रिया पहले पन्द्रह मिनट से शुरु करने के बाद एक घंटा तक की जा सकती है इस क्रिया के द्वारा भी अजीब अजीब कारण और रोशनी आदि सामने आती है उस समय भी अपने को स्थिर रखना पडता है। इस क्रिया को करने से पहले तामसी भोजन नशा और गरिष्ठ भोजन को नही करना चाहिये। बेल्ट को भी नही बांधना चाहिये। इसे करने के बाद धीरे धीरे मानसिक भ्रम वाली पोजीशन समाप्त होने लगती है।

तीसरी जो शरीर की मशीनी क्रिया के नाम से जानी जाती है,वह शब्द को लगातार मानसिक रूप से उच्चारित करने के बाद की जाती है उसके लिये भी पहले की दोनो क्रियाओं को ध्यान मे रखकर या एकान्त और सुलभ आसन को प्राप्त करने के बाद ही किया जा सकता है,नींद नही आये या मुंह के सूखने पर पानी का पीना भी जरूरी है। बीज मंत्र जो अलग अलग तरह के है उन्हे प्रयोग मे लाया जाता है,भूमि तत्व के लिये केवल होंठ से प्रयोग आने वाले बीज मंत्र,जल तत्व को प्राप्त करने के लिये जीभ के द्वारा उच्चारण करने वाले बीज मंत्र,वायु तत्व को प्राप्त करने के लिये तालू से उच्चारण किये जाने वाले बीज मंत्र और अग्नि तत्व को प्राप्त करने के लिये दांतो की सहायता से उच्चारित बीज मंत्र का उच्चारण किया जाता है साथ ही आकाश तत्व को प्राप्त करने के लिये गले से उच्चारण वाले बीज मंत्रो का उच्चारण करना चाहिये।ज्योतिष भगवत प्राप्ति और भविष्य को देखने की क्रिया के लिये दूसरे नम्बर की क्रिया के साथ तालू से उच्चारित बीज मंत्र को ध्यान मे चलाना चाहिये। जैसे क्रां क्रीं क्रौं बीजो का लगातार मनन और ध्यान को दोनो आंखो के बीच मे नाक के ऊपरी हिस्से मे ध्यान को रखकर किया जाना लाभदायी होता है।