यत्र तत्र सर्वत्र

मैनपुरी जिला के मकरन्दपुर गांव में श्रीरामनरेश सिंह के यहां गया हुआ था। उनके घर के ईशान में एक मन्दिर बना था,उस मन्दिर के नैऋत्य में एक उजाड घर बना हुआ था,गांव में पक्का घर था,लेकिन उजाड पडा था,कोई रिहायस नही थी। वास्तु का नियम है कि ईशान कोण का मन्दिर या चोटी रखने वाला भवन कभी भी नैऋत्य को फ़लीभूत नही करता है। यह बात और जगह भी देखी,मन्दिर के नैऋत्य के अन्दर रिहायस हो ही नही सकती है। इसी प्रकार से नैऋत्य दिशा में पानी का कुंआ उत्तर के घर में नर संतान को पैदा नही होने देती,अगर कोई नर संतान हो भी जाती है तो वह या तो घर छोड कर चली जाती है अथवा नई पीढी आने के पहले वह किसी आक्समिक हादसे में गुजर जाती है। अग्निकोण का निवास भी नकारात्मक बनाने के लिये काफ़ी है,जिन घरो में सम्मिलित परिवार रहते है,और उन घरों में जो भी परिवार का सदस्य अग्नि कोण में निवास करता होगा,वह कितना भी पढा लिखा या ज्ञानवान हो लेकिन बाकी सदस्यों के लिये नकारात्मक ही होगा। नैऋत्य का बरगद का पेड भी नर संतान को हरने वाला होता है,केवल स्त्री संतान होती है और घर का मुखिया जवानी में या अधेड अवस्था में नेत्र हीन हो जाता है। घर के अग्नि में पानी होने से घर की स्त्री को कोई ना कोई बीमारी लगी ही रहती है। घर के ईशान में रखे जूते चप्पल झाडू कचरादान बाप बेटे में जूते चलवाते है,घर की संतान आचार विचार विहीन हो जाती है,यही हाल घर के ईशान में टायलेट आदि बनवाने के बाद भी देखने को मिले है। दक्षिण दिशा के दरवाजे वाले मकान मन्दिरों अस्पतालों इन्जीनियरिंग स्थानों लोन देने वालों और भोजन बनाकर बेचने वालों के लिये दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की देते है,इस दिशा वाले पुलिस स्टेशन अन्य दिशा वाले पुलिस स्टेशनों से अधिक नाम कमा लेते हैं। उत्तर दिशा वाले स्थानों में धन का कार्य करने वाले और पबल्सिंग करने वाले संस्थान अधिक फ़लीभूत होते है।


अग्नि कोण के गेट वाले घरों में और उत्तर की तरफ़ सीढियों वाले मकान कभी भी कर्जे से मुक्त नही हो पाते है। जिन घरों के दरवाजे नैऋत्य में होते है और उनके नैऋत्य में ही अगर पानी के टेंक अन्डरग्राउंड बना दिये गये हैं तो उस मकान के रहने वाले जीवन भर कोर्ट केशों और सरकारी कर्जों से मुक्त नही हो पाते है। अक्सर इस दिशा के दरवाजे वालों के दो ही पुत्र होते है जिनके अन्दर बडे पुत्र के कारण पूरे घर की सम्पत्ति का विनाश हो जाता है,और अंत में वह भी एक पुत्री के होने के बाद अपनी लीला किसी तामसी कारण से समाप्त कर लेता है। अग्नि कोण में हवादार कमरा बना लेने से घर की एक महिला राजनीति या समाज में अपना स्थान बना लेती है लेकिन उस घर की अन्य स्त्रियों के ऊपर अपने आप कष्ट आते रहते हैं। जिस घर के अन्दर उल्लू निवास कर लेते है उन घरों में अक्सर आगे की पीढी में उजाड ही हो जाते हैं। अग्नि का पानी चलने वाली पीढी से भी आगे की पीढी को नुकसान करता है। पूर्व दिशा का भाग अधिक ऊंचा होने पर या बरामदा आदि को ऊंचा बनाने पर संतान की बुद्धि मंद होती चली जाती है। आर्थिक तंगी भी अक्सर इस दिशा में ऊंची जगह बनाने पर देखी जाती है। पूर्व उत्तर में अगर रिक्त स्थान नही होगा तो पुत्र संतान नही होगी,अगर होगी भी तो विकालांग होगी,पूर्व दिशा में किसी भवन से सट कर मकान बनाया जायेगा और पश्चिम में खुला स्थान रखा जायेगा तो भवन का मालिक रोगी और अल्पायु होगा। मकान के अग्नि कोंण में कोई द्वार नही बनाया जाता है,अगर रखा जाता है तो घर में आग का भय अथवा आग वाले कारणॊं में अधिक खर्चा होता है,घर में मुकद्दमे आदि चलते रहते हैं। आर्थिक तंगी और स्त्रियों सम्बन्धी परेशानी आती रहती है। पूर्व दिशा के खाली होने पर अगर पश्चिम दिशा भी खाली है तो मकान के मालिक को लकवा जैसी बीमारी हो सकती है,अथवा वह आंखों के रोग से पीडित रह सकता है। अगर घर में किरायेदार रखना है तो खुद तो ऊंचे हिस्से में रहे और किरायेदार को नीचे हिस्से में रखें,किरायेदार के न होने पर नीचे स्थान को खाली नही रखें,अगर खाली रहता है और प्रयोग में नही लाया जा रहा है तो अनचाही समस्या से घिरना लाजमी हो जाता है। पूर्व पश्चिम लम्बा मकान सूर्य वेधी और उत्तर दक्षिण मकान चन्द्र वेधी कहलाता है,चन्द्र वेधी मकान ही शुभ माना जाता है,सूर्य वेधी मकान कुल का नाशक माना जाता है।